
अशोकनगर।पिछले तीन सालों से मौसम की मार
झेल रहे किसानों के सामने आर्थिक संकट आन खड़ा हुआ है। कई किसान कर्ज व परेशानियों
के बोझ को सहन नहीं कर सके और उन्होंने आत्महत्या कर ली। लेकिन किसानों के परिवारों
को कर्ज से मुक्ति नहीं मिली।
किसान द्वारा लिया गया ये कर्ज आज भी उनके सिर
पर है। जबकि अन्य प्रकार के कर्ज लेने पर ऎसा नहीं होता। कर्ज के साथ ही कंपनियां
कर्ज का भी बीमा करती हैं और कर्ज लेने वाले की मौत होने पर कंपनी उसका भुगतान करती
है, इससे कर्जदार के परिवार पर कर्ज चुकाने का बोझ नहीं आता।
उल्लेखनीय
है कि मकान, दुकान और वाहन ऋण बीमा में पॉलिसी के एक साल बाद बीमित व्यक्ति के
आत्महत्या करने पर परिजन को ऋण बीमा की सभी सहूलियतें मिलती हैं, लेकिन किसान को
खेती के लिए दिए गए ऋण बीमा में कोई सहूलियत नहीं मिलती है।
जब अन्य
ऋणों पर बैंक सहूलियतें देते हैं तो फिर कृषि ऋण में क्यों नहीं? बीमा कंपनियों के
ऎसे दोहरे नियम होने से किसान को मौत के बाद भी कर्ज से छुटकारा नहीं मिल रहा है और
उसका परिवार कर्ज में डूबा रहता है।
इससे कर्ज में डूबे किसान के परिवार
को दोहरी मार झेलनी पड़ रही है। एक तरफ तो कमाने वाला चला जाता है, दूसरा कर्ज का
बोझ छोड़ जाता है। किसान के मरने के बाद परिवार की मुसीबत खत्म नहीं होती। पीडित
परिवार इसमें फंसते जा रहे हैं।
इसलिए नहीं किसान लोन बीमा में
राहत
खेती लोन बीमा में किसान को सहूलियत नहीं मिलने को लेकर दो प्रमुख
कारण हैं। पहला तो यह कि खेती लोन सिर्फ एक सीजन के लिए दिया जाता है, जबकि
कंपनियों की यह गाइड लाइन है कि आत्महत्या और सामान्य मौत के प्रकरण में बीमा की
सहूलियतों का लाभ पॉलिसी के एक साल बाद ही दिया जाएगा।
दूसरा प्रमुख
कारण यह है कि फसल का खराब होना प्रकृति पर आधारित होता है। किसान का यह संकट
प्राकृतिक है, जिसके लिए सरकार मुआवजा देती है। यदि किसी किसान की फसल कीट व्याधि
के प्रकोप से खराब होती है तो किसान की लापरवाही है कि उसने सुरक्षा के लिए समय पर
कीटनाशकों को छिड़काव क्यों नहीं किया।
किसानों पर करोड़ों का
कर्ज
जिले में खेती किसानी से परिवार चलाने वाले किसानों की संख्या करीब
02 लाख 30 हजार है। इनमें से 67 किसानों ने खाद, बीज के लिए बैंक के केसीसी में
कर्जा ले रखा है। सूखा एवं अफलन से सोयाबीन एवं उड़द में 8 0 से 90 फीसदी तक नुकसान
हुआ है। वहीं धान में ओलावृष्टि से कहीं 50 प्रतिशत से अधिक नुकसान हुआ है। कर्ज
में डूबे किसान आत्महत्या करने को मजबूर हैं। एक किसान ने आत्म हत्या कर ली है और
दो ने आत्महत्या की कोशिश की। वहीं रबी सीजन में मुंगावली तहसील के दो किसानों ने
बर्बाद होने पर आत्महत्या कर ली थी।
सिर्फ हादसे पर मदद
बैंक
किसान के कृषि लोन का बीमा पेस स्कीम के तहत करते हैं। यह पॉलिसी सिर्फ हादसे को
कवर करती है। यदि किसी किसान की खेत में काम करते हुए करंट लगने से या थ्रेसिंग के
दौरान मशीन की चपेट में आने से मौत होती है तो किसान को क्लेम राशि के रूप में 50
हजार रूपए की मदद दी जाती है।
फसल बर्बाद होने पर किसान आत्महत्या करता
है या फिर सदमे से उसकी मौत होती है, तो बीमा कंपनी कोई राहत नहीं देती है। वहीं
दूसरी तरफ लाइफ इंश्योरेंस में पॉलिसी के एक साल बाद बीमित व्यक्तिके आत्महत्या
करने पर भी पीडित के परिजन को बीमा की सभी सहूलियतें दी जाती हैं।
कैसे मिले
कर्ज से राहत
फसल बर्बाद होने पर कर्ज में डूबे किसान के आत्महत्या करने पर
पीडित परिवार की मदद के लिए सरकार की तरफ से पहल होने की जरूरत है। सरकार बीमा
कंपनियों को निर्देश दे कि वह ऎसी पॉलिसी तैयार करें, इसमें कर्जदार किसान के
आत्महत्या करने पर बीमा की सहूलियतों को लाभ दिया जाए। बैंक यह भी सुनिश्चित करें
कि खेती लोन देने के साथ कि किसान का बीमा हो।
फसल बर्बादी की भेंट चढ़े
किसान
ईसागढ़ विकासखंड के ग्राम मढ़ी महिदपुर में कर्ज के बोझ तले दबे
किसान श्रीराम यादव ने 03 अक्टूबर को घर के बाहर लगे पेड़ से लटकर आत्म हत्या कर ली
थी। उसके सिर पर करीब दो लाख रूपए का कर्ज था। बेटी की शादी भी करनी थी। लेकिन दस
बीघा में मात्र एक क्विंटल उड़द निकला और उसके सारे सपने टूट गए। हताश होकर उसने
मौत को गले लगा लिया।
ईसागढ़ के ही ग्राम लहिदपुर के किसान मुलायमसिंह यादव ने
भी 22 अक्टूबर को कर्ज के कारण मौत हो गले लगाने का प्रयास किया था। जहर खाने से
हालत बिगड़ने के बाद परिजनों ने उसे अस्पताल पहुंचाया, जहां उपचार के बाद उसकी जान
बच गई। उसके 19 बीघा के खेत में मात्र तीन-चार क्विंटल ही सोयाबीन निकला
था।
ग्राम हमीदपुर निवासी कृषक रामबाबू की पत्नि कल्लो बाई (30) ने 29 अक्टूबर
को कर्ज और लेनदारों के बाद-बार के तकादे से तंग आकर जहरीला पदार्थ खा लिया
था।
हालांकि परिजनों के तुरंत अस्पताल लाने से उसकी जान बच गई। दस बीघा
के खेत में मात्र एक बोरा सोयाबीन ही निकला था और कर्ज चुकाने की स्थिति नहीं
थी।
207 करोड़ का बीमा
खरीफ सीजन 2015 के लिए जिले में 27 हजार 500
किसानों का बीमा हुआ है। इसकी बीमा राशि 207 करोड़ है और 23 अक्टूबर तक की रिपोर्ट
के अनुसार 06 करोड़ 37 लाख रूपए का प्रीमियम जमा किया जा चुका है।
होता है
क्लेम
क्रेडिट कार्ड वालों का पर्सनल एक्डेंटल बीमा होता है। सभी केसीसी
होल्डर किसान बीमित होते हैं। अलग से एक बीमा कराया जाता है, इसमें 50 हजार तक का
क्लेम होता है। लेकिन इसमें लोन एमाउंट कवर नहीं होता। कर्ज तो किसान को भरना ही
पड़ेगा। महेश शर्मा, लीड बैंक अधिकारी अशोकनगर।
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