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पश्चिम बंगाल के हंगसेश्वरी काली मंदिर में पशु बलि पर रोक, 209 वर्षों तक दिवाली पर जारी रही प्रथा

Ban on Animal Sacrifice after 209 years in Hooghly kali temple: सन् 1814 से लेकर अबतक हंगसेश्वरी काली मंदिर में दिवाली पर पशु बलि की परंपरा रही लेकिन इस मंदिर का रखरखाव करने वाले परिवार ने दिवाली पर होने वाली पशु बलि प्रथा बंद करने का फैसला लिया है। आइए जानते हैं कि अब यहां पशु की बलि की जगह किस चीज की बलि दी जाएगी?

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Stop Animal Sacrifice in Hangseshwari Kali Mandir: पश्चिम बंगाल में हुगली जिले के बांसबेरिया में काली के मंदिर में इस बार दिवाली पर पशु बलि नहीं दी जाएगी। मंदिर के 209 वर्षों के इतिहास में ऐसा पहली बार होगा। मंदिर में हंगसेश्वरी काली की पूजा होती है। इस मंदिर में पूजा के दौरान सदियों से पशु बलि की परंपरा जारी रही। मंदिर का रख-रखाव करने वाले बांसबेरिया के देब रे परिवार ने इस साल से पशु बलि पर रोक का फैसला किया है। परिवार के एक सदस्य ने कहा, 'हम सभी इस पर सहमत हुए कि इस प्रथा को बंद किया जाना चाहिए।'

बलि भय की भावना पैदा करती है: समाजशास्त्री

समाजशास्त्री सुकन्या सरबदिखारी का कहना है कि बलि भय की भावना पैदा करती है। हम ऐसे युग से गुजर रहे हैं, जहां संवेदनशीलता बढ़ी है। इस तरह की क्रूरता देखना मुश्किल है। इसके अलावा पारिस्थितिक संतुलन भी चिंता का विषय है। पशुओं की रक्षा की जानी चाहिए। धर्म इसमें बड़ी भूमिका निभा सकता है।

काली को अर्पित किए जाएंगे नारियल-कद्दू

मंदिर में अब काली को अर्पित करने के लिए केले और कद्दू जैसे विकल्प चुने जाएंगे। विशेषज्ञों का कहना है कि स्मृति-ग्रंथ में इन विकल्पों का उल्लेख है। पशु बलि के अनुष्ठान को रोकने से कोई नुकसान नहीं होगा। रामकृष्ण मिशन के एक वरिष्ठ पुजारी ने बताया कि पशु बलि रोकने के लिए स्वामी विवेकानंद ने भी पहल की थी।

इस मंदिर में रामकृष्ण परमहंस ने भी की थी पूजा

काली का यह विशाल पांच मंजिला मंदिर 1814 में बना था। यह तांत्रिक वास्तुकला का भी प्रतिनिधित्व करता है। बांसबेरिया के लोगों का कहना है कि रामकृष्ण समेत कई संतों और आध्यात्मिक गुरुओं ने मंदिर में देवी की पूजा की थी।

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