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महिला सशक्तिकरण के नए सोपान गढ़ रहीं ढाणियों की महिलाएं

— 66 बीघा में बेर की खेती, कम मेहनत में अधिक लाभ का दावा नागौर जिले में लाखनपुरा- गौरवपुरा के बीच ढाणियों में रहने वाली महिलाओं ने स्वावलंबन व आत्मनिर्भरता की अनूठी मिसाल पेश की है। कृषक संतरा, रेशमी, नाथी, संज्या, मोहनी, रामेश्वरी, कमला, गंगा और पतासी 15 साल से देशी बेर की खेती में जुटी हैं। इन्होंने अपने मजबूत हौसलों और संकल्प के सहारे पथरीली भूमि में कृषि को एक अलग रूप दिया है। पुरुषवादी समाज में ये किसान महिला सशक्तिकरण के नए सोपान भी गढ़ रही हैं।

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नागौर

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VIKAS MATHUR

Dec 26, 2022

महिला सशक्तिकरण के नए सोपान गढ़ रहीं ढाणियों की महिलाएं

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अक्टूबर में होते हैं शुरू
महिला किसानों ने बताया कि थाई एप्पल बेर पौधों के अक्टूबर माह में लगने शुरू हो जाते हैं और जनवरी माह में पककर तैयार हो जाते हैं। 5 साल बाद प्रति पेड़ से 50 किलो बेर उतरते है। महाशिवरात्रि के पर्व पर इस बेर की अधिक मांग होती है।

ढाई बीघा में 100 पौधे
बनगढ के युवा किसान रामनिवास मंडीवाल बेरों की खेती के साथ बिक्री में महिलाओं का सहयोग कर रहे हैं। किसान ने ढाई बीघा में चौमू से थाई एप्पल बेर के 100 पौधे लाकर लगाए। दूसरे साल ही पौधों में फल आनेे लगे। इससे इस साल अच्छी कमाई होने की उम्मीद है।

35 रुपए किलो तक बिकते हैं देसी बेर
देसी बेर बाजार में 30 से 35 रुपए किलो बिकते हैं। इस सर्दी के सीजन में भी कृषकों को अच्छा उत्पादन मिलने की उम्मीद है। बेर के पेड़ से पहली बार में दो से पांच किलो, दूसरी बार में बीस से चालीस किलो, जबकि पांच साल बाद सवा क्विंटल तक फ ल लिए जा सकते हैं।

आबोहवा के अनुरूप बेर की खेती
संतरा देवी ने बताया कि प्रदेश की आबोहवा के अनुरूप देशी बेर के अलावा थाई एप्पल,काजरी और गोला आदि किस्में उपयुक्त हैं। बेर की खेती के जीवांश अधिकता वाली दोमट व बुलई मिटटी सर्वोत्तम है। इसकी खेती में कम मेहनत व कम लागत लगती है। एक बार वर्षा ही पर्याप्त रहती है।

प्रति बीघा 30 हजार तक कमाई
महिला व पुरुष कृषकों ने 66 बीघा में 430 बेर के पेड़ लगा रखे हैं। इनसे एक बीघा में 30 हजार रुपए तक सालाना कमाई हो रही है। किसान बताते है कि पौधे लगाने के 14 से 18 माह बाद बेर के पेड़ तैयार हो जाते है। एक बार फल लेने के बाद इनसे 15-20 साल तक फ ल लिए जा सकते है। साथ ही वे हर साल खरीफ फ सल भी लेते है। पेड़ों के नीचे खाली जमीन में मूंग, चवला, बाजरे व तिल लेकर उन्नत खेती कर रहे हैं।

मोतीराम प्रजापत— चौसला