
उत्तर प्रदेश में नगर निकाय के चुनाव होने हैं, ऐसे में यह जानना जरूरी है। नगर निगम में मेयर और कमिश्नर का काम क्या होता है। मेयर की अगर बात करें तो इनका कार्यकाल 5 साल का होता है। यह शहर के प्रथम नागरिक के रूप में जाने जाते हैं।
मेयर की सहमति के बाद निगम परिषद की बैठक नगर निगम परिषद के स्पीकर बुलाते हैं। इस बैठक में तय एजेंडे पर फैसले लिए जाते हैं। मेयर इसके सभापति होते हैं। इसमें न्यूनतम 5 और अधिकतम 11 सदस्य शामिल होते हैं। इन्हें विभिन्न समितियों का प्रभारी बनाया जाता है।
नगर आयुक्त सरकारी अधिकारी के रूप में काम करते हैं। इन्हें नगर निगम का प्रशासनिक मुखिया भी कहा जाता है। सरकार से मिलने वाले आदेशों और फैसलों की जिम्मेदारी भी इन्हीं की होती है। यह प्रशासनिक नियंत्रण के लिए जोन व्यवस्था के रूप में भी काम करते हैं।
मेयर के अधिकार
15 लाख रुपए तक के विकास काम के लिए धनराशि सीधे मंजूर हो जाती है। 3 लाख से कम की आबादी पर ये धनराशि 10 लाख रुपए है। इसके अलावा नगर नगर कमिश्नर सीधे तौर पर पांच लाख रुपए मंजूर कर सकता है। इसके लिए महापौर परिषद से अनुमोदन चाहिए होता है।
महापौर, एमआईसी या निगम परिषद द्वारा लिए जाने वाले निर्णयों की जिम्मेदारी नगर निगम की रहती है।
महापौर अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले कार्य का प्रस्ताव बनाकर बोर्ड़ की मीटिंग में प्रस्तुत कर नगर आयुक्त को सौंपते हैं। प्रस्ताव के मुताबिक उस पर अमल प्रक्रिया शुरू की जाती है। मुखिया के नाते नगर निगम की जिम्मेदारियों को पूरा करवाना महापौर का दायित्व होता है।
उत्तर प्रदेश में 17 नगर निगम है। इस लिस्ट में प्रदेश के सभी बड़े शहरों के नाम शामिल हैं। पहला लखनऊ नगर निगम का बजट जो 2162 करोड़ रुपये का है। यह सभी नगर निगम मे सबसे ज्यादा बजट वाला शहर है। इसके बाद कानपुर, वाराणसी, गोरखपुर, मुरादाबाद और झांसी जैसे शहरों का नाम आता है।
10 नगर निगमों का बजट कुछ इस प्रकार है -
322 करोड़ रुपये झांसी नगर निगम का बजट है
417 करोड़ रुपये मुरादाबाद नगर निगम
452 करोड़ रुपये गोरखपुर नगर निगम
730 करोड़ रुपये मेरठ नगर निगम
750 करोड़ रुपये वाराणसी नगर निगम
800 करोड़ रुपये प्रयागराज नगर निगम
572 करोड़ रुपये अलीगढ़ नगर निगम
752 करोड़ रुपये आगरा नगर निगम
1375 करोड़ रुपये कानपुर नगर निगम
1367 करोड़ रुपये गाजियाबाद नगर निगम
74वें संशोधन के बाद भी नहीं बने कानून
नगर निगम का बजट सदन बनाता है और उसे पारित करता है। पैसे के लिए नगर निगम को शासन पर निर्भर होना पड़ता है। चूंकि नगर निगम के पास रेविन्यू बनाने के ज्यादा साधन नहीं होते हैं। इस वजह से बजट में बनाई गई कई योजनाओं को लागू करना मुश्किल हो जाता है।
74वें संशोधन के लागू हो जाने के बावजूद इससे संबंधित कानून अभी कई राज्यों में नहीं बन पाए हैं। इनमें उत्तर प्रदेश का भी नाम शामिल है। ऐसा हो जाने के बाद राजस्व और अन्य साधन नगर निगम व मेयर के पास उपलब्ध होंगे।
नियम-कानून में मेयर के अधिकारों का दायरा सीमित है
मेयर को शहर के प्रथम नागरिक माना जाता है। मेयर नगर निगम के पार्षदों के अधिकारों और ऐसे काम करने के लिए सक्षम है, जिसके लिए शासन से धन लेना आवश्यक नहीं होता है। नियम-कानून में मेयर के अधिकारों का दायरा सीमित है। उसके कार्यों की स्वीकृति का वित्तीय अधिकार भी सीमित है।
अधिकार के तौर पर देखें तो मेयर अपनी कैबिनेट यानी मेयर इन काउंसिल का गठन करते हैं। निगम अध्यक्ष कार्य करने में असमर्थ हो तो महापौर कभी भी विशेष सम्मेलन बुला सकते हैं। महामारी या संकट की स्थिति में ऐसे काम के लिए महापौर आदेश दे सकते हैं जो तुरंत जरूरी हों। कई मामलों में मेयर अपने अधिकार को मेयर इन कौंसिल को सौंप सकती है।
Published on:
16 Dec 2022 04:20 pm
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