
dr. birbal sahni
लखनऊ.डॉ. बीरबल साहनी भारत में वनस्पति विज्ञान के जनक थे। उन्होंने ही भारत में वनस्पतियों को पहचान दिलाई। उनके जीवन का आखिरी समय लखनऊ में ही बीता। यही पर उन्होंने अपने ड्रीम प्रोजेक्ट बीरबल साहनी इंस्टिट्यूट ऑफ पैलियो बॉटनी की स्थापना की। ये कहना है एनबीआरआई से वनस्पति विज्ञान में प्रथम पीएचडी करने वाले डॉ. राकेश पांडेय का। उन्होंने बताया कि डॉ. साहनी ने भारत के वनस्पतियों का अध्यन किया और पुरावनस्पती शास्त्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इन विषयों पर अनेकों पत्र और जर्नल लिखने के साथ-साथ बीरबल साहनी नेशनल अकैडमी ऑफ साइंसेज, भारत, के अध्यक्ष और इंटरनेशनल बोटैनिकल कांग्रेस, स्टॉकहोम, के मानद अध्यक्ष रहे।
उत्तर प्रदेश से है खास रिश्ता
डॉ. राकेश पांडेय बताते हैं कि बीरबल साहनी का उत्तर प्रदेश से खास रिश्ता रहा है। लंदन के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त करने के बाद सन् 1919 में वे भारत वापस आ गये और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में वनस्पति शास्त्र के प्राध्यापक के रूप में कार्य करने लगे।
इसके बाद उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय में भी कार्य किया परंतु यहां भी वे कुछ ही समय रहे क्योंकि सन 1921 में उनकी नियुक्ति लखनऊ विश्वविद्यालय में नव-स्थापित वनस्पति शास्त्र विभाग के अध्यक्ष के रूप में हो गई। कैंब्रिज विश्वविद्यालय ने उनके शोधों को मान्यता दी और सन 1929 में उन्हें Sc. D. की उपाधि से सम्मानित किया। वर्ष 1933 में प्रो. साहनी को लखनऊ विश्व विद्यालय में डीन पद पर नियुक्त किया गया। सन 1943 में लखनऊ विश्वविद्यालय में जब भूगर्भ विभाग स्थापित हुआ तब उन्होंने वहां अध्यापन कार्य भी किया।
कहां हुआ था जन्म
डॉ. बीरबल साहनी का जन्म 14 नवम्बर 1891 में शाहपुर जिले (अब पाकिस्तान में) के भेढा नामक गांव में हुआ था। भेढा नमक की चट्टानों एवं पहाङियों से घिरा हुआ एक सुन्दर और रमणीक गांव था। बीरबल साहनी की प्रारंभिक शिक्षा लाहौर के सेन्ट्रल मॉडल स्कूल में हुई और उसके पश्चात वे उच्च शिक्षा के लिये गवर्नमेंट कॉलेज यूनिवर्सिटी, लाहौर, और पंजाब यूनिवर्सिटी गये। सन 1914 में उन्होंने कैंब्रिज विश्वविद्यालय के इम्मानुएल कॉलेज से स्नातक की उपाधि ली और उसके बाद प्रोफेसर ए. सी. नेवारड (जो उस समय के श्रेष्ठ वनस्पति विशेषज्ञ थे) के सानिध्य में शोध कार्य में जुट गये। सन 1919 में उन्हें लन्दन विश्वविद्यालय से डॉक्टर ऑफ़ साइंस की उपाधि अर्जित की।
इन पुरस्कारों से हुए सम्मानित
प्रो. बीरबल साहनी ने वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र महत्वपूर्ण कार्य किया जिसे देश-विदेष में सराहा गया और सम्मानित किया गया। सन 1930 और 1935 में उन्हें विश्व कांग्रेस पुरा वनस्पति शाखा का उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया। वे भारतीय विज्ञान कांग्रेस के दो बार (1921 तथा 1928) अध्यक्ष निर्वाचित हुए। सन 1937-38 तथा 1943-44 में वे राष्ट्रीय विज्ञान एकेडमी के प्रधान रहे। 1929 में कैम्ब्रिज विश्व विद्यालय ने डॉ. साहनी को Sc. D. की उपाधि से सम्मानित किया। सन 1936-37 में लन्दन के रॉयल सोसाइटी ने उन्हें फैलो निर्वाचित किया।10 अप्रैल 1949 को दिल का दौरा पड़ने से यह महान वैज्ञानक परलोक सिधार गया।
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