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शहर के किले में झलकती ऐतिहासिक विरासत

नादौती. कस्बा शहर के ऐतिहासिक किले प्रदेश के प्रमुख किलो में विशेष पहचान है। अतीत की ऐसिहासिक और सांस्कृतिक विरासत से संपन्न यह किला कस्बा शहर के मध्य अरावली पर्वत माला पर मौजूद है। इतिहासकारों के अनुसार कच्छावाओं के आगमन से पहले यहां मीणाओं का आधिपत्य था। यहां के कच्छवाहे आम्बेर के प्रतापी शासक राजा पृथ्वीराज के पुत्र पच्याण के वंशज है। पच्याण के पौत्र व विठलदास के कनिष्ट पुत्र हरिदास से शहर के शासकों का वंशक्रम चला। इन पच्याणोत कछवाहों का मुख्य स्थान जयपुर जिले का कस्बा सांभरिया है जो काणोता स

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शहर के किले में झलकती ऐतिहासिक विरासत

केप्शन नादौती के कस्बा शहर में पहाड़ी पर ऐतिहासिक किला।

शहर के किले में झलकती ऐतिहासिक विरासत
नादौती. कस्बा शहर के ऐतिहासिक किले प्रदेश के प्रमुख किलो में विशेष पहचान है। अतीत की ऐसिहासिक और सांस्कृतिक विरासत से संपन्न यह किला कस्बा शहर के मध्य अरावली पर्वत माला पर मौजूद है। इतिहासकारों के अनुसार कच्छावाओं के आगमन से पहले यहां मीणाओं का आधिपत्य था। यहां के कच्छवाहे आम्बेर के प्रतापी शासक राजा पृथ्वीराज के पुत्र पच्याण के वंशज है। पच्याण के पौत्र व विठलदास के कनिष्ट पुत्र हरिदास से शहर के शासकों का वंशक्रम चला। इन पच्याणोत कछवाहों का मुख्य स्थान जयपुर जिले का कस्बा सांभरिया है जो काणोता से लगभग १८ किलोमीटर की दूरी पर है। इतिहासकारों के अनुसार किले पर कब्जे के लिए पूर्व में कई आक्रमण हुए, लेकिन किला अभेद्य होने के कारण दुश्मन परास्त हो गए।

शिल्पकारी में झलकती है भव्यता

शहर के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व की झलक यहां किले की शिल्पकारी, स्मारकों में झलकती है। गंगापुर-अलवर मार्ग से गुजरने वाले राहगीरों को यह किलो दूर ही दिखता है। इसकी भव्यता देखकर हर कोई मोहित हो जाता है। इस सोलह बुर्ज के अभेद्य दुर्ग में ऊपर जाने के लिए आमेर के किले की तर्ज पर घुमावदार रास्ता बना है। किले के भीतर स्थापत्य कला का सुंदर चित्रण दिखता है। इसमें जनाने और मर्दाने महल, सिलहखाना शस्त्रागार, अन्न भण्डार तथा वर्षा जल संरक्षित करने के लिए दो विशाल टांके बने हंै। इनमें एक टांका जीर्ण-शीर्ण हो गया है।

तीन दिशाओं में है गुप्त सुरंग

शत्रु के आक्रमण के समय किले से सुरक्षित बाहर निकलने के लिए तीन दिशाओं में गुप्त सुरंग बनी हुई है। गांव की बसावट परकोटे के अंदर थी। जिसके चारों और गहरी खाई बनी हुई थी। जिसके प्राचीन अवशेष आज भी है। प्राचीर का मुख्य दरवाजा उत्तर दिशा में है। गांव में सोप दरवाजा, कैमा दरवाजा, खूड़ा दरवाजा यहां के प्रमुख प्रवेश द्वार थे। इनका नामकरण निकटवर्ती गांवों के नाम से हुआ। यहां सुंदर भित्ति चित्र, धार्मिक, लौकिक तथा प्राचीन मानव जीवन के विभिन्न पक्षों का चित्रण देखने को मिलता है। शहर के राजप्रसाद, मंदिरों, हवेलियों तथा यहां के शासकों की छतरियों में ऐतिहासिकता दिखाई देती है।

शेरा माता मंदिर है आस्था का केन्द्र

किले के मध्य एक लघु चट्टान पर शेरा माता का प्राचीन मंदिर है। प्रतिवर्ष चैत्र व आश्विन मास के नवरात्राओं में यहां विशेष आयोजन होते हैं। इसके पास ही श्रीसीताराम जी, शिवजी का मंदिर भी है। करीब आठ दशक पूर्व बारूद के विस्फोट से किले का एक बुर्ज व प्राचीर क्षतिग्रस्त हो गई थी। शेरा माता के मंदिर में समय समय पर धार्मिक आयोजन होते रहते हैं। यहां प्रचुर संख्या में उत्कृष्ट देव मंदिर है। जिनमें लक्ष्मीनाथजी, मुरलीधरजी, रघुनाथ, सीताराम, केशवराय, गोपालजी, मदनमोहनजी, मानबिहारी, रसिक बिहारी आदि के मंदिर भी मौजूद हैं।