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इस मजार पर बकरीद के चांद का है विशेष महत्व

इसी प्रकार जिले के अकबरपुर के समीप रूरा-अकबरपुर मार्ग पर स्थित प्राचीन हजरत मजनू शाह रहमत बाबा की मजार का भी यही करिश्मा है।

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Majar in Kanpur

Majar in Kanpur

कानपुर देहात| किसी न किसी मान्यता को लेकर धर्मों के अनुरूप मंदिर व मस्जिद सभी का अपना अलग महत्व है। इसी प्रकार जिले के अकबरपुर के समीप रूरा-अकबरपुर मार्ग पर स्थित प्राचीन हजरत मजनू शाह रहमत बाबा की मजार का भी यही करिश्मा है। जहाँ प्रतिवर्ष बकरीद के चांद पर विशाल उर्स मेला लगता है। जिसमें दूर दराज से लोग आते हैं और बाबा की मजार को चूमकर मन्नते मांगते हैं। करीब 500 वर्ष पुरानी इस मजार की सेवा कर रहे फकीर अल्लाह मान का कहना है कि इस मजार पर आकर सभी की दुआयें कबूल होती है। अधिकांश महिलायें औलाद की दुआयें मांगने इस मजार पर आती हैं। यहाँ आने वाले की हर मुराद पूरी होती है। इस ख्याति के लिये यह मजार लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है। बकरीद के चांद के बाद यहां नातिया मुशायरा किया जाता है। भव्य उर्स सजने लगती है।

मदीना सरकार के आदेश पर यहाँ ली थी समाधि

मजनू शाह बाबा की मजार का बहुत पुराना इतिहास है। बताया गया कि करीब 50 वर्ष पूर्व मजनू शाह बाबा मक्का मदीना मे मोहम्मद साहब की सेवा करते थे। एक दिन अचानक उनको मोहम्मद साहब ने ख्वाब में आकर कहा कि इस स्थान पर तशरीफ फरमाकर लोगों को रहमत बांटे। जिसके बाद हजरत मजनू शाह अकबरपुर के इस स्थान पर आकर रहने लगे। आदेश मिलते ही उन्होंने एक दिन यहाँ समाधि ले ली। जिसके बाद लोंगो ने उनकी छोटी सी मजार बनवा दी। और फिर अकबरपुर के अहमद अली इस मजार की सेवा में लग गये। उनके देहांत के बाद उनके पुत्र मकसूद अली
14 वर्ष की अवस्था में मजार पर सेवारत हो गये और 89 वर्ष तक सेवा कार्य करने के बाद उनका इंतकाल हो गया।

बकरीद के चांद के बाद होती है उर्स की तैयारियां

इस मजार का प्रारम्भिक निर्माण मकसूद अली ने कराया था। जिसके बाद उन्होंने सेवा की। उनके निधन के बाद एक चिश्तिया कमेटी का गठन किया गया। जिसके अध्यक्ष डॉन टेलर ने लोंगो के सहयोग से इस मजार का पुनरुद्धार कराया। जहाँ आज उर्स के दौरान भक्तों का सैलाब उमड़ता है। फकीर अल्लाह मान का कहना है कि मकनपुर मदार साहब ने हजरत मजनू शाह को शेर की उपाधि दी थी। मदार साहब के ये शिष्य थे। बकरीद के चांद निकलने पर इस मजार पर एक विशाल उर्स का आयोजन होता है। 4 सितम्बर से लगने वाली चार दिवसीय उर्स की तैयारियां जोर
शोर से शुरू हो गयी है| उर्स के पहले दिन ही नातियां मुशायरा का कार्यक्रम आयोजित किया जायेगा। 73 वर्षों से विशाल उर्स मेला लगता है। जिसमे दूर दराज जनपदों के लोग इस दर को चूमते हैं। और मजार के मुख्य द्वार पर एक पालीथीन बांधकर मन्नत मांगते हैं।

मजार के फकीर अल्लाह मान का कहना है कि उनकी चार पीढियों से इस मजार की सेवा करने का सिलसिला जारी है। लोंगो की मन्नत कुबूल होने के बाद जब लोग दर को चूमते हैं, तो खुशी का ठिकाना नहीं रहता है। आज भी उनके इशारे पर ही यहाँ सारे काम होते हैं। हजरत मजनू शाह सरकार की रहमत है कि सैकड़ो भक्तों का तांता लगता है।