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Onion Price: सरकार गिराने वाला प्याज फिर खराब कर सकता है सियासत की फसल

चुनावी सीजन में प्याज की कीमतें (Onion price) सियासत की पूरी ‘फसल’ खराब कर सकती है। कर्नाटक चुनाव में अब इसका खतरा बढ़ा तो केन्द्र ने तुरंत ही डेमेज कंट्रोल का प्रयास किया, लेकिन अब एक बार फिर प्याज तेवर दिखाने लगा है।

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जोधपुर। चुनावी सीजन में प्याज की कीमतें (Onion price) सियासत की पूरी ‘फसल’ खराब कर सकती है। कर्नाटक चुनाव में अब इसका खतरा बढ़ा तो केन्द्र ने तुरंत ही डेमेज कंट्रोल का प्रयास किया, लेकिन अब एक बार फिर प्याज तेवर दिखाने लगा है। राजनीतिक पार्टियां जितना पेट्रोल-डीजल के भाव बढ़ने से नहीं डरती, उतना प्याज के भावों से डरती हैं। पिछले 20 दिन में यही प्याज रसोई का गणित बिगाड़ रहा है। ढाई गुना तक बढ़े थोक और खुदरा भावों ने एक बार फिर राजनीतिक समीकरण प्रभावित करने शुरू कर दिए हैं।

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माना जाता 1998 में भैरोसिंह शेखावत की सरकार के जाने के पीछे बड़ा कारण यही प्याज था। इसके कई किस्से भी हैं। चुनावी जानकार तो यहां तक बताते हैं कि एक बार इंदिरा गांधी ने तो प्याज की माला पहन कर प्रचार कर किया था। एक बार फिर पांच राज्यों में चुनाव है और प्याज के भाव लगातार बढ़ रहे हैं। व्यापारी बताते हैं कि अभी दिवाली तक तो इसके दाम में कमी आने के आसार नहीं है। अगर जमाखोरी और निर्यात पर कोई सख्ती होती है तो भाव में कमी आ सकती है।

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कुछ ऐसे बढ़े भाव
- पिछले 20 दिन में लगातार बढ़ रहे हैं प्याज के भाव।
- थोक में प्याज के भाव 15 से 30 रुपए प्रति किलो थे।
- अब थोक में 35 से 55 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गए हैं भाव।
- खुदरा क्षेत्र में 60 रुपए से लेकर 70 रुपए प्रति किलो तक भाव पहुंच गए हैं।

सरकार ने ड्यूटी लगाई वह भी नाकाफी
केन्द्र सरकार ने प्याज के निर्यात को नियंत्रित करने के लिए 40 प्रतिशत तक ड्यूटी लगाई, लेकिन इसका भी किसानों व व्यापारियों ने विरोध किया। हालांकि इस ड्यूटी का ज्यादा असर नहीं हुआ और प्याज का निर्यात लगातार जारी है।

यह है कारण
प्याज के थोक व्यापारी नसीम मोहम्मद बताते हैं कि निर्यात लगातार बढ़ रहा है। साथ ही पिछले दिनों मौसम की मार के कारण भी प्याज की काफी फसल खराब हो गई। चुनावी सीजन को देखते हुए जमाखोरी भी दाम बढ़ने का एक बड़ा कारण है। प्याज की नई फसल को बाजार में आने में समय लगा। इसी कारण डिमांड और सप्लाई में गेप आया।

कुछ ऐसे दखल रखता है सियासत में प्याज
- 1977 से 1980 में जनता पार्टी की सरकार में प्याज की कीमतें काफी बढ़ गई थी। 1980 के आम चुनाव में इंदिरा गांधी ने इसे बड़ा मुद्दा बनाया था और प्याज की माला पहन कर प्रचार किया था।
- 1980 में यह नारा चला कि जिस सरकार का कीमत पर जोर नहीं, उसे देश चलाने का अधिकार नहीं।
- 1998 में दिल्ली में भाजपा की सरकार थी और मदनलाल खुराना मुख्यमंत्री थे। प्याज की कीमतें बढ़ीं और विपक्षी दलों ने सरकार को घेरना शुरू किया। भाजपा ने एक-एक कर पहले खुराना फिर साहिब सिंह वर्मा और फिर सुषमा स्वराज को मौका दिया, लेकिन प्याज की कीमतों पर काबू नहीं पा सके। इसके बाद भाजपा की हार हुई।
- 1998 में ही राजस्थान विधानसभा चुनाव में भी प्याज मुद्दा बना। भाजपा के मुख्यमंत्री भैरोसिंह शेखावत ने विधानसभा चुनाव हारने के बाद कहा- प्याज हमारे पीछे पड़ा था।