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साग-रोटा खाना है तो चले आओ चिड़ावा

व्यवसायी से जुड़े लोगों ने बताया कि सागा-रोटा की सीजन सर्दी यानी नवंबर से फरवरी तक चलती है। अधिकांश दुकानों में सप्ताह के बुधवार, शुक्रवार और रविवार को साग-रोटा तैयार किए जाते हैं।

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साग-रोटा खाना है तो चले आओ चिड़ावा

साग-रोटा खाना है तो चले आओ चिड़ावा

#sag rota

चिड़ावा.चिड़ावा के पेड़ों के अलावा यहां का साग-रोटा भी देशभर में खूब चाव से खाया जाता है। इस लजीज डिश की बड़े-बड़े शहरों में भी डिमांड है। यहीं वजह हैकि महज चार माह की सीजन में पूरे जिले में करीब तीन करोड़ से ज्यादा का कारोबार हो जाता है। व्यवसायी से जुड़े लोगों ने बताया कि सागा-रोटा की सीजन सर्दी यानी नवंबर से फरवरी तक चलती है। अधिकांश दुकानों में सप्ताह के बुधवार, शुक्रवार और रविवार को साग-रोटा तैयार किए जाते हैं। कुछ दुकानों पर प्रतिदिन भी तैयार होने लगे। साग-रोटा की फुल और हॉफ डाइट तय कर रखी है। जिसमें फुल डाइड के 4सौ तथा हॉफ डाइट के दो सौ रुपए लिए जाते हैं। व्यवसाय से जुड़े लोग बताते हैं कि साग-रोटा करीब चार दशक से ज्यादा समय पहले चलन में आया था। जो कि घर-घर में दस्तक दे चुका है। देशी घी से बना होने के कारण सेहत को भी नुकसान नहीं पहुंचाता।

#chirawa ka sag rota
पकौड़ी हो तो गुढ़ागौडज़ी जैसी
गुढागौडज़ी. कस्बे में सरकारी अस्पताल के बाहर बिकने वाली पकौड़ी अपने अनोखे स्वाद के लिए काफी प्रसिद्ध है। गुढागौडज़ी के रतनलाल यहां पिछले 35 वर्षों से पकौड़ी बना रहे है। मूंग और मोठ की दाल से बनने वाली इन पकौडिय़ों का स्वाद आस-पास के गांवों तक भी चखा जाता है। रतनलाल शर्मा ने बताया कि खासकर सर्दियों में इनकी मांग ज्यादा रहती है। इन दिनों ग्राहकों की लाइन इनकी दुकान के आगे हर वक्त लगी रहती है।

#sag rota of chirawa
चिड़ावा के पेड़ों का जायका अलग, देशभर में डिमांड
चिड़ावा.झुंझुनूं जिले का चिड़ावा शहर लजीज पकवानों के कारण देशभर में पहचान रखता है। यहां के पेड़ों ने अलग पहचान बनाई है। प्रतिदिन चिड़ावा से लाखों के पेड़े ब्रिकी होते हैं। जिसे खरीदने के लिए बाहर से भी लोग पहुंचते हैं। मिठाई में चिड़ावा का पेड़ा ब्रांड बन चुका है। जिसका सालाना व्यापार 50 करोड़ के बीच पहुंच जाता है। इस व्यवसायी से चार-पांच हजार लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार भी मिल रहा है। मिठाईव्यवसायी रजनीश राव और शीशराम हलवाई बताते हैं, चिड़ावा में करीब नौ दशकों से पेड़े बनाए जा रहे हैं। जिसके स्वाद व शुद्धता में कोई फर्क नहीं आया। यहां के पेड़ों की विशेषता है कि लंबे समय तक खराब भी नहीं होते। जिसकी वजह शुद्ध मावा, यहां का पानी, दूध व उसकी घुटाई को माना जाता है।
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