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जिस स्कूल में बैठने की भी व्यवस्था नहीं थी, आज राष्ट्रीय स्तर पर मिली पहचान

ग्रामीण अंचलों के बच्चों को अंग्रेजी बोलना सिखाया , अब विद्यार्थी सरकारी सेवा में

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झाबुआ

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Binod Singh

Sep 05, 2022

जिस स्कूल में बैठने की भी व्यवस्था नहीं थी, आज राष्ट्रीय स्तर पर मिली पहचान

जिस स्कूल में बैठने की भी व्यवस्था नहीं थी, आज राष्ट्रीय स्तर पर मिली पहचान

झाबुआ. ग्रामीण अंचलों में आज भी शिक्षा व्यवस्था ठीक नहीं है , ऐसे में आज से 20 से 25 वर्ष पहले प्राथमिक विद्यालय खरडू छोटी और प्राथमिक विद्यालय खांडयाखाल मेें पदस्थ दो शिक्षकों ने न सिर्फ विद्यार्थियों का भविष्य संवारा बल्कि पूरे क्षेत्र में शिक्षा का अलख जगा दिया ।
उनकी यही सेवा उन्हें आदर्श शिक्षक बनाती है। यहां इन स्कूलों में कई वर्षों से सेवा दे रहे दो शिक्षकों ने अपनी मेहनत और लगन के सहारे पूरे क्षेत्र को शिक्षित कर समाज की मुख्य धारा से जोडऩे का काम किया। शिक्षक दिवस पर जिले के ऐसे दो शिक्षकों का परिचय जानते हैं, जिन्होंने बच्चो को शिक्षित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने आदिवासी जिला झाबुआ में शिक्षा का अलख जगाने के लिए अपना अमूल्य योगदान दिया।
प्राथमिक विद्यालय खांड्या खाल
1995 में पहली बार इस स्कूल में रेणु कछावा की पदस्थापना हुई। वे बताती हैं कि जब वह पहली बार स्कूल आई थीं तब बिङ्क्षल्डग नहीं थी, टाट पट्टी भी नहीं थी , बोर्ड भी टूटा हुआ था, ऐसे में साल भर निकल गया। क्षेत्र में अशिक्षा का जाल फैला था। यहां पर अपराध भी अधिक थे। साल भर बाद यहां पर ग्रामीणों के आपसी विवाद में 5 मर्डर हुए थे, लोग डर से मकान खाली कर गए थे। स्कूल में इक्का-दुक्का बच्चे भी नहीं आते थे। लोगों में शिक्षा का अलख जगाने के लिए आंगनबाड़ी कार्यकर्ता से दोस्ती बढ़ाई दो बच्चों किशनपाल और दिनेश चौहान को पढ़ाना शुरू किया। जब यह बच्चे 5वीं की परीक्षा दे रहे थे ,तब बोर्ड परीक्षा के लिए दूसरे केंद्र पर जाना होता था। इन बच्चों को पर्चा हल करते देख एग्जामिनर चकित रह गए। दोनों बच्चे अच्छे नंबरों से पास हुए । विद्यालय से निकलकर बड़ी स्कूल में पहुंचे तो आसपास के लोगों ने भी अपने बच्चों को विद्यालय भेजना शुरू किया। साल भर ऐसे ही निकल गया , मैं बच्चों को पढ़ाना चाहती थी, इसलिए मैंने कर्डावद बड़ी ट्रांसफर मांग लिया, लेकिन गांव वालों ने कलेक्टोरेट में मेरा ट्रांसफर रुकवाने के लिए प्रदर्शन किया। 10 दिन बाद ही मेरा ट्रांसफर निरस्त हो गया और मैं फिर से उसी स्कूल में जाने लगी। मैंने महिलाओं से दोस्ती बढ़ाई और उनके बच्चों को स्कूल भेजने का कहा। बच्चों को मैंने ङ्क्षहदी बोलना सिखाया। शुरू में लोग हंसी उड़ाते थे, लेकिन बच्चों में हो रहे परिवर्तन को देखकर लोगों का समर्थन मिलना शुरू हुआ। तत्कालीन विधायक पवेङ्क्षसह पारगी ने स्कूल की बिङ्क्षल्डग बना कर दी। अब यह शाला राज्य स्तर पर चैंपियन शाला के नाम से जानी जाती है। राज्य स्तर पर कई अवॉर्ड सेरिमनी में मुझे बुलाया गया, मेरे अनुभव साझा किए गए। मुझे इनाम भी मिला। लॉक डाउन में बच्चों की पढ़ाई के लिए मैंने पांचवी एवं आठवीं पास विद्यार्थियों के ग्रुप बनाएं हमने घर- घर जाकर रेडियो से पढ़ाई की। कोरोना के कारण बहुत से लोगों ने दूरी बना ली है तो मंदिरों में और पेड़ के नीचे कक्षाओं को संचालित किया। मेरे वीडियो राज्य स्तर पर भेजे गए, इससे मुझे राज्य स्तरीय पुरस्कार भी मिला। सीएम राइज पुस्तक में भी मेरे अनुभव को प्रकाशित किया। यूनिसेफ ने इस पर फिल्म भी बनाई है। 2006 से मैं बीएलओ हूं और मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि है आधार से नामावली को 100त्न ङ्क्षलक करना। इसके लिए मैं स्कूल समय से 2 घंटे पहले और स्कूल छूटने के 2 घंटे बाद तक गांव में सर्वे करने जाती थी। आज खंडिया खाल और आसपास के बच्चे ना सिर्फ पढ़ाई में बल्कि डांस, कहानी और खेल गतिविधियों में भी आगे बढ़ रहे हैं। स्कूल में 136 बच्चे हैं और प्रतिदिन 100 से अधिक उपस्थिति रहती है।
-तीसरी क्लास के बच्चे बोलते हैं अंग्रेजी
प्राथमिक विद्यालय खरडू छोटी में पदस्थ सहायक शिक्षक मोहम्मद शाह बताते हैं कि सन 2000 में उनकी पोङ्क्षस्टग विद्यालय में हुई थी। तब बच्चे यहां ठीक से ङ्क्षहदी भी नहीं पढ़ पाते थे। आज तीसरी क्लास के बच्चे भी इंग्लिश पढऩा और बोलना जानते हैं।2000 से पहले यहां के बच्चे आठवीं तक भी नहीं पढ़ पाते थे, लेकिन आज यह बच्चे सरकारी नौकरियां कर रहे हैं । उच्च शिक्षा में है और बड़े शहरों में भी जॉब कर रहे हैं। 2000 में 30 बच्चे भी दर्ज नहीं थे। आज 103 बच्चे दर्ज है।यहां के सभी बच्चों की अंग्रेजी भाषा पर अच्छी पकड़ है। इसका कारण इन बच्चों को मोहम्मद शाह द्वारा पैटर्न और चार्ट बना कर अंग्रेजी भाषा की सीख देना है। यहां से पढ़ें जिन बच्चों की शादी हो गई है और उनके बच्चे स्कूल जाने लगे हैं , वे लोग भी अपने गांव की स्कूलों को छोडक़र खरडू बड़ी प्राथमिक विद्यालय में अपने बच्चों को प्रवेश दिलाने आते है। इसमें पीथमपुर , उमरिया दरबार, रोटला आदि गांव के बच्चे भी शामिल है। शिक्षक मोहम्मद शाह का कहना है की पहले तो इन बच्चों को ठीक से ङ्क्षहदी बोलना भी नहीं आता था, लेकिन अब इन्हें अंग्रेजी की भी अच्छी समझ है बिना डरे बिना रुके यह अंग्रेजी पढ़ और बोल लेते हैं । अब इन्हें तीन भाषाओं का ज्ञान है जिसमें ङ्क्षहदी अंग्रेजी और इनकी मातृभाषा भी शामिल है। ना सिर्फ यह बच्चे इंग्लिश पढ़ते हैं बल्कि उसका मतलब भी समझते हैं।