
मिशाल हैं डॉ. राजेंद्र प्रसाद मिश्र, 27 साल तक इस वजह से बने ग्राम प्रधान
जावेद अहमद की रिपोर्ट...
जौनपुर. जब मानव, समाजसेवा के लिए अपना सबकुछ न्योछावर कर देता है तो उसे लोग देवता की श्रेणी में रखने लगते हैं। कुछ ऐसा ही था बक्शा थानांतर्गत चुरावनपुर गांव निवासी डॉ. राजेंद्र प्रसाद मिश्र के साथ। नाम जुबां पर आते ही जिले भर के लोगों के दिल में श्रद्धा भाव उत्पन्न कर देने वाले स्व0 मिश्र की शख्सियत का कोई सानी नहीं है। चिकित्सक की डिग्री लेने के बाद भी वे गांव में रूके। गरीब-परेशान को रोग मुक्त करने का संकल्प उन्होने आखिरी सांस तक नहीं छोड़ा। शायद इससे बेहतर प्रेरणा स्रोत समाजसेवा का मिलना मुश्कित है।
5 सितंबर 1940 को जन्मे डा. राजेन्द्र प्रसाद मिश्र की शिक्षा-दीक्षा इलाहाबाद विश्विद्यालय, कलकत्ता विश्वविद्यालय और काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हुई थी। गांव से ऐसा नाता जुड़ा था कि, चिकित्सक की उपाधि मिलने के बाद उन्होंने लाखों कमाने के लिए शहर का रूख नहीं किया। वे अपने पैतृक गांव आ गये। गरीबों की सेवा को अपना धर्म माना और गरीबों की खुशी में ही अपनी खुशी देखते रहे। डॉ. राजेंद्र प्रसाद मिश्र जी का मानवीय व्यक्तित्व बहुत ही पारदर्शी हुआ करता था। उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्यपाल और साहित्य के उद्भट विद्वान् प्रोफेसर विष्णुकांत शास्त्री कलकत्ता विश्वविद्यालय में उनके गुरु हुआ करते थे।
पिता आदेश और मिट्टी की पुकार सुनकर गांव में दीन-दुखियों का उपचार शुरू कर दिया। लोग दूर-दूर से उनसे इलाज कराने आते रहे। कोई दवाओं का मूल्य दे पाता, कोई नहीं। फिर भी आर्थिक असमर्थता किसी के भी उपचार में बाधा न बन सकी। उनके प्रति सम्मान ही था कि 27 वर्ष तक वे गांव के प्रधान बने रहे। कोई उनके विरोध में चुनाव लड़ने तक सामने नहीं आया। डा. मिश्र साधन सहकारी समिति के सभापति, कई विद्यालयों के अध्यक्ष व प्रबंधक रहे।
अपने आचरण, व्यवहार, निर्णय, समर्थन-असमर्थन में वे हमेशा पारदर्शी रहे। उनके व्यवहार में कृत्रिमता कभी नहीं पाई गई। डा. राजेंद्र प्रसाद मिश्र एक कुशल चिकित्सक के साथ साहित्य लेखन, समाज उपयोगी क्रियाकलापों, पत्रकारिता एवं सामाजिक कल्याण के कामों में भी रूचि रखते थे। सत्तर से लेकर नब्बे के दशक तक शायद ही कोई राष्ट्रीय पत्र रहा हो जिसमें उनके विचारोत्तेजक आलेख न प्रकाशित हुए हों। दिनमान-रविवार जैसी पत्रिकाओं ने उन्हें कई बार पुरस्कृत भी किया। 5 अक्टूबर 1999 को उन्होंने अंतिम सांस ली।
अब बेटे मनोज ने उठाया समाजसेवा का बीड़ा
डॉ. राजेंद्र प्रसाद मिश्र के समाज सेवा अभियान को उनके बेटे डॉ. मनोज मिश्र आगे बढ़ा रहे हैं। वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग में प्रवक्ता श्री मिश्र एक कुशल विज्ञान संचारक के तौर पर भी जाने जाते हैं। उन्होंने सर्पदंश में फैले अंधविश्वास के उन्मूलन का बीड़ा उठाया। पिता राजेन्द्र मिश्र की तरह ही डा. मनोज के मन में भी हमेशा गरीब और बेसहारों की सेवा का भाव रहा। गांव इनसे भी नहीं छूटा। वहां के लोगों की सेवा और सहायता को इन्होंने भी धर्म बना रखा है। अब लोग उन्हें ही उनके पिता के स्थान पर देख रहे हैं।
Updated on:
01 Jan 2018 02:11 pm
Published on:
01 Jan 2018 02:05 pm
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