
जयपुर. गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की 82वीं पुण्यतिथि पर जयपुर रंगमंच की धुरी रवीन्द्र मंच पर सोमवार को ‘टैगोर दिवस’ मनाया गया। मंच प्रबंधक प्रियव्रत ङ्क्षसह चारण ने टैगोर की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि दी और मंच कर्मचारियों एवं रंगकर्मियों के साथ उन्हें याद किया।
विभिन्न स्कूलों से आए बच्चों ने मुख्य सभागार में टैगोर के जीवन, उनकी कविताओं, कहानियों से प्रेरित नाटक और अन्य सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं। एकादशी फाउंडेशन के अध्यक्ष विभूति ङ्क्षसह ने टैगोर के जीवन पर बच्चों से चर्चा की। उमा श्रीवास्तव ने उनके लिखे गीत ‘मोंटा रे...’ की प्रस्तुति से समां बांध दिया।
बचपन से ही कला से था प्रेम
रबिन्द्रनाथ के बचपन से लेकर उनके महाप्रयाण तक की पूरी जीवन यात्रा को नाटक ’ठाकुर’ के जरिए प्रस्तुत किया गया। कलावत के.एल. लिखित एवं निर्देशित इस नाटक में दिखाया कि देवेन्द्रनाथ ठाकुर के यहां जन्मे रवीन्द्र को बचपन से ही कला से प्रेम था। १४ वर्ष की उम्र में मां के देहांत का दर्द वह सहन नहीं कर पाते। भाई ज्योति ने उन्हें मुश्किल हालात में संभाला और घर पर ही संगीत एवं शिक्षा का वातावरण दिया। महज आठ वर्ष की उम्र में उन्होंने अपनी पहली कविता लिखी। विदेश से वकालत की पढ़ाई छोडक़र भारत आने के बाद उन्होंने उपन्यास, कहानियों, कविताओं और गीतों से अपने विचारों को अभिव्यक्ति देना शुरू किया और ‘टैगोर’ से ‘गुरुदेव’ बन गए।
स्वाधीनता संग्राम में लेखनी से दी ऊर्जा
नाटक में दिखाया कि स्वतंत्रता संग्राम में उनके विचारों और लेखनी ने भारतीयों में एक नई ऊर्जा भर दी। स्वदेशी आंदोलन में भाग लेना, गांधी जी के विचारों से प्रभावित होना, बंकिम चटर्जी से मुलाकात, यह सब घटनाएं टैगोर के जीवन को लगातार प्रेरित करती रहीं। इसी दौरान उनकी लिखी ’गीतांजलि’ को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है। महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन भी उनके मुरीदों में शुमार हैं। शांति निकेतन की स्थापना टैगोर ने प्रकृति के बीच अध्ययन के महत्व को दर्शाने के लिए की थी। चित्रकारी, कविताओं, गीतों और कहानियों की विरासत के साथ वह देश को राष्ट्रगीत का उपहार देकर हमेशा के लिए अमर हो जाते हैं।
Published on:
07 Aug 2023 11:16 pm
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