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राज्य से लेकर केन्द्र तक सब जगह लाचार, राष्ट्रीय नीति से भी गायब बच्चों की मदद

दुर्लभ बीमारी पीड़ितों का दर्द, नई नीति बनी, लेकिन उसमें भी शामिल नहीं हुई फंडिंग केन्द्र व राज्य के अंशदान से आसान हो सकती है मासूम बच्चों के इलाज की राह

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जयपुर

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Vikas Jain

Aug 11, 2021

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विकास जैन

जयपुर. दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित बच्चों को जहां उपचार के लिए जहां करोड़ों रूपए की दरकार होती है, वहीं इन रोगों के लिए बनी राष्‍ट्रीय नीति से भी बच्चों की उम्मीदें पूरी नहीं हो पा रही है। इन बच्चों के उपचार के लिए काम करने वाली संस्थाओं के मुताबिक इन बीमारियों से पीड़ितों के लिए फंडिंग सहायता न दिया जाना अनगिनत जिंदगियों के लिए मौत को दावत देना जैसा साबित हो रहा है। इनका मानना है कि केन्द्र व राज्य सरकार ने पीड़ित मरीजों को उनके हाल पर छोड़ दिया है।

राष्ट्रीय नीति के अनुसार लाइसोसोमल स्टोरेज डिसऑर्डर (एलएसडी) जैसी बीमारियों को ग्रुप 3 में शामिल किया गया है। ये ऐसी बीमारियां हैं, जिनका निश्चित उपचार उपलब्ध है, लेकिन बेहद खर्चीला व आजीवन चलने वाला है।

नई नीति से भी नहीं मिली राहत...

लंबे समय से उपचार की आस लगाए मरीजों के लिए नई नीति में कोई सहायता नहीं दी गयी है। इसमें दुर्लभ रोगों के उपचार के लिए पूर्व की राष्‍ट्रीय नीति 2017 को यथावत रखा गया है। जीवन रक्षक उपचार के लिए कोई भी फंडिंग सहायता नहीं दी गई है। जिसके कारण कई बच्चे जान गंवा चुके हैं। ग्रुप 1 और ग्रुप 2 के विपरीत, ग्रुप 3 विकारों से प्रभावित मरीजों को लगातार उपचार की आवश्‍यकता होती है। ड्रग्‍स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया के अनुसार संबंधित विकारों के लिए उपचार देश में पहले से ही उपलब्‍ध हैं।

सालाना करीब 80 से 100 करोड़ रूपए के बजट की जरूरत

दुर्लभ बीमारियों के शिकार ऐसे मरीजों के लिए सालाना 80-100 करोड़ रुपए से अधिक की आवश्‍यकता नहीं होती। यदि समग्र रूप से देखा जाये, जिसे केन्द्र व राज्य सरकार मिलकर वहन कर सकती है। केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे कुछ राज्‍य इसका पहले ही संकेत दे चुके हैं।


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