पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी का कहना है कि अन्न संस्कृति है सभ्यता नहीं। जगद्गुरु रामानंदाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय में जगद्गुरु रामानंदाचार्य का दार्शनिक संसार पर राष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन सोमवार को अन्नाद्भवंति भूतानि… पर विज्ञान दृष्टि विषय पर अपने विचार व्यक्त करतें हुए उन्होंने कहा कि अन्न के माध्यम से हुई भविष्य में संस्कारों का जन्म होता है इसलिए अन्न की शुद्धि से ही मन की शुद्धि का सबसे बड़ा कारण होता है। उन्होंने कहा कि अन्न के भी भोक्ता की तरह चार वर्ण और सत्व-रज- तमो गुण हैं। हमारे भी चार वर्ण हैं।
जिन चीजों का हम भोग करते हैं वहीं अन्न – कोठारी
उनका कहना था कि अन्न ही संस्कृति है और जिन चीजों का हम भोग करते हैं वहीं अन्न है । अन्न सिर्फ खाद्य पदार्थ ही नहीं होते बल्कि एक दूसरे से हम विचारों का जो आदान प्रदान करते हैं वह भी अन्न ही है, क्योंकि विचारों का भी हम उपभोग कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि किसान अन्न उपजाता है लेकिन माता पिता संतान को पैदा नहीं करते आत्मा को पैदा करते हैं और सृष्टि अन्न के आदान प्रदान से चलती है। संवाद भी अन्न है जो एक दूसरे को कंज्यूम कर रहे हैं। यह देश आत्मा पर आधारित है आत्मा मरती नहीं है।
उनका कहना था कि हम सृष्टि के अभिन्न अंग हैं। अत: सृष्टि की हर रचना के साथ जुड़े हुए हैं। हम सब एक.दूसरे का अन्न भी हैं। हमारा जीव अन्न के माध्यम से ही शरीर में आता है इसलिए उसके भी चार अंग होती हैं। जैसे गेंहू में चापड़ यानी शरीर, स्नेहन यानी मन, मधु यानी बुद्धि और अमृत यानी आत्मा। हमारे स्वधर्म रूप वर्ण भी चार प्रकार के होते हैं- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। जीव के निर्माण के साथ ही अंहकृति-प्रकृति- आकृति तीनों बन जाते हैं।
जगत के मूल में दो ही तत्व,एकअग्नि दूसरा सोम
उनका कहना था कि अन्न से मन बनता है। मन में इच्छा उत्पन्न होती है। प्राणों में क्रिया और वाक का निर्माण इच्छा का आधार है। इच्छा ही माया और ज्ञान ब्रह्म है। जैसा मन, वैसी इच्छा, वैसा ही कर्म। कोठारी ने कहा कि मन की दो गतियां होती हैं- सृष्टि साक्षी और मुक्ति साक्षी। जब व्यक्ति मुक्ति की ओर बढ़ता है तब उसका चित्त उध्र्वगति करने लगता है। मन भी आनंद विज्ञान की ओर हो जाता है। स्थूल धरातल छूटकर सूक्ष्म में प्रवेश करता है। उन्होंने कहा कि जगत के मूल में दो ही तत्व हैं एक अग्नि दूसरा सोम। सूर्य के ऊपर सोम है, सूर्य और पृथ्वी अग्रि पिंड हैं। सोम ही वायु और अप् बनता हुआ नीचे प्रवाहित होता है। अग्रि यम आदित्य बनता हुआ ऊपर उठता है। सोम नीचे आकर अग्रि बन जाता है। अग्नि ही ऊपर जाकर सोम का रूप लेती है। उनका कहना था कि ब्रह्म नहीं बदलता इसलिए सत्य कहलाता है। विश्व परिवर्तनशील है इसलिए विवर्त कहलाता है।
अन्न के प्रसंग में श्रुति है सर्वमिदमन्नाद: सर्वमिदमन्न। अन्नाद का अर्थ है ग्रहण करने वाला, खाने वाला। इसका अर्थ है कि सब कुछ अन्न हैं और सभी कुछ अन्नाद हैं। जिसका जिससे निर्वाह होता है वही उसका अन्न है, जैसे आकाश का अन्न शब्द है। पंचभूतों से निर्मित इस शरीर का पोषण अन्न से होता है। भुक्त अन्न भी पंचभूतों से ही बनता है। अन्न से ही सप्तधातुओं सहित मन का भी निर्माण होता है इसलिए छान्दोग्य श्रुति कहती है कि यह मन अन्नमय है।
वेद में कहा है अग्नि-सोमात्मकं जगत। सोम को अन्न और अग्नि को भोक्ता कहते हैं। यज्ञ से ही नया निर्माण होता है। अनेक स्वरूपों में अन्न भी उच्छिष्ट ही होता है, आहुति कर्ता का। कहते हैं अन्न उच्छिष्ट से ही सृष्टि होती है। कई प्राणी भी अन्य प्राणियों का अन्न बनते हैं। शास्त्र कहते हैं.जीवो जीवस्य भक्षणम्। अन्न का स्वामी चन्द्रमा है और मन का भी स्वामी चन्द्रमा है। यह भी कहावत है कि जैसा खावे अन्न, वैसा होवे मन। मन और शरीर के पोषण में अन्न की ही भूमिका रहती है।
स्वामी रामानंद ने भगवान की भक्ति को दिया महत्व- प्रो. विष्णुपाद
संगोष्ठी में दिल्ली के लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रो.विष्णुपद महापात्र ने कहा कि स्वामी रामानंद ने लोक कल्याण के लिए ज्ञान और कर्म की बजाय भगवान की भक्ति और शरणागति को महत्व दिया। सभी जातियों व वर्गों में बिना भेदभाव के अपने शिष्य बनाए और उन्हें भारतीय इतिहास में अमर कर दिया। महात्मा कबीर, रैदास, धन्ना जाट,सेन भगत व पीपा के माध्यम से उन्होंने भक्ति को अंतिम छोर तक पहुंचाया।
जड़ व चेतन ब्रह्म का अंश – प्रो. रामसेवक दुबे
संगोष्ठी में रेवासा की अग्रदेवाचार्य पीठ के स्वामी राघवाचार्य ने स्वामी रामानंद द्वारा स्थापित की गई सामाजिक समरसता पर व्याख्यान दिया। अयोध्या के पं.अजय कुमार शर्मा ने रामानंद संप्रदाय की संगीत शैली पर प्रस्तुति दी। कुलपति प्रो. रामसेवक दुबे ने गीता की चर्चा करते हुए जड़ व चेतन को ब्रह्म का अंश बताया। उन्होंने कहा कि ब्रह्म ही संपूर्ण चराचर का उपभोक्ता है इस नाते ब्रह्म में सृष्टि के पालन,निर्माण और संहार तीनों शक्तियां विद्यमान हैं। संगोष्ठी संयोजक दर्शन विभागाध्यक्ष शास्त्री कौसलेंद्रदास ने स्वामी रामानंद द्वारा गीता पर रचित आनंद भाष्य की चर्चा करते हुए उसे भक्ति योग का ग्रंथ बताया।
इससे पहले प्रात:कालीन सत्र की अध्यक्षता प्रो विष्णुपद महापात्र ने की। सत्र में डॉ सारिका वाष्र्णेय,डॉ.शंभु कुमार झा और अयोध्या के स्वामी सत्यनारायणदास के व्याख्यान रामानंद दर्शन पर हुए। सायंकालीन सत्र में प्रो. जवाहर लाल, डॉ. चेतना कुमावत, डॉ. माया वर्मा और डॉ.मंजु पटेल और डॉ. कुलदीप सिंह पालावत के व्याख्यान हुए। संगोष्ठी संयोजक शास्त्री कोसलेंद्रदास ने बताया कि संगोष्ठी के समापन सत्र के मुख्य अतिथि वरिष्ठ विधायक नरपत सिंह राजवी व प्रताप सिंह सिंंघवी होंगे। समारोह में त्रिवेणी के महंत रामरिछपालदास और अयोध्या के महंत मिथिलेशनंदिनीशरण उपस्थित रहेंगे।