
सरकारी स्कूल से आईएएस तक का सफर
जयपुर। अक्सर कहा जाता है कि एक सरकारी स्कूल और हिंदी मीडियम के स्टूडेंट्स के लिए काफी मुश्किल होता है, एक मुकाम हासिल करना। और इंग्लिश मीडियम के स्टूडेंट्स के बीच अपनी अलग पहचान बनाना। लेकिन ऐसे अभाव कभी सफलता में बाधा नहीं बनते बल्कि अभावों में सपने देखने वालों के लिए सफलता मुश्किल नहीं होती। ऐसा ही कुछ कहती हैं, गुजरात कैडर की आईएएस अधिकारी सुरभि गौतम।
लालटेन की रोशनी में की पढ़ाई
सरकारी स्कूल की सबसे आगे की लाइन में बिछी दरी पट्टी पर बैठने वाली सुरभि गौतम लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी के 2017 के ट्रेनिंग बैच में भी अव्वल हैं। वो सुविधाएं न होने या अपने अभावों को मुश्किलें कतई नहीं कहती। सरकारी स्कूल में पढ़ना, दरी पट्टी पर बैठना, अंधेरा होने पर लालटेन की रोशनी में एग्जाम की तैयारियां करने को वो जिंदगी की परेशानियों में नहीं गिनती। वो तो कहती हैं कि जब तक आप न चाहो, तब तक कोई बात या कमी आपको मुश्किल में नहीं डाल सकती। आपके पास सुविधाएं हैं तो अच्छी बात हैं, पर नहीं हैं तो इसे आप बहाने बनाने के काम में ले सकते हैं। सफल होने के लिए अभावों को पीछे छोड़ चलते जाना पड़ता है, हर हाल में, हर मुश्किल में। ऐशो—आराम को खारिज कर ही किसी पद तक पहुंचा जा सकता है।
इंग्लिश नहीं आने पर बैठी पिछली बैंच पर
मध्यप्रदेश के सतना जिले के अमदरा गांव की 26 वर्षीय सुरभि। हाई स्कूल तक अपने गांव की सरकारी स्कूल में अव्वल रहने वाली सुरभि कुछ ऐसी ही मुश्किलें पार कर भोपाल की इंजीनियरिंग कॉलेज पहुंची। स्कूल में सबसे आगे बैठने वाली सुरभि के लिए स्थिती तब असहज हो गई, जब इंग्लिश नहीं आने से उन्हें क्लास की सबसे पीछे वाली बैंच पर बैठना पड़ता। लेकिन पीछे हो जाना सुरभि ने सीखा ही कब। बिना किसी इंग्लिश कोचिंग क्लास जॉइन किए, नए शब्द सीखती गई और अपने सब्जेक्ट में पहले ही साल टॉप कर लिया। जैसे अंधेरा और दरी पट्टी उसके टॉप करने में बाधा नहीं बन सके, वैसे ही इंग्लिश की बाधा को भी यहां पार कर लिया। असाधारण प्रतिभाएं यों ही हैरान कर देती हैं। सुरभि ने तब फिर हैरान कर दिया, जब बिना किसी कोचिंग के उन्होंने आईएएस 2016 एग्जाम पहले ही अटेम्प में पास कर लिया । यही नहीं पहली बार में उन्हें रैंक भी 50वीं मिल गई और कैडर गुजरात। हालांकि सुरभि राजस्थान या मध्यप्रदेश कैडर ही चाहती थी, लेकिन यह न हो सका।
राजस्थान कैडर की थी उम्मीद
सुरभि का कहना है कि गुजरात में सामाजिक और आर्थिक स्थिति मध्यप्रदेश, राजस्थान की तुलना में बेहतर है। राजस्थान और मध्यप्रदेश में सुधार की बहुत गुंजाइश है। आईएएस में 50वीं रैंक हासिल करने से पहले वो 2013 की इंडियन इंंजीनियरिंग सर्विसेज में भी टॉप कर चुकी है। और भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर में साइंटिफिक ऑफिसर के पद पर कार्य कर चुकी हैं। वो कहती हैं कि मैं जब तक किसी टॉपिक को पूरी तरह समझ नहीं लेती थी, तब तक उसे पढ़ती रहती थी। पढ़ाई के लिए कभी घंटे तय नहीं किए। जो लोग टाइम टेबल से चलते हैं, वो मशीन बनने के अलावा कुछ नहीं बनते। मेरा स्कूल और वहां का एजुकेशन सिस्टम काफी खराब था। स्कूल में कोई पढ़ाई नहीं होती थी, तो मेरी पढ़ाई की जिम्मेदारी मुझ पर और मेरे पेरेंट्स पर ही थी। पर इसका मुझे कोई अफसोस नहीं करती, क्योंकि मेरे अभावों ने ही मुझे सपने देखने की ताकत दी और मैं हर फील्ड में सबसे अच्छा करने की कोशिश करती रही।
सुरभि अपनी सफलता का श्रेय अपने परिवार को ही देती हैं। पिता वकील हैं और मां टीचर। बड़े भाई डेंटिस्ट हैं और छोटा भाई अभी हाई स्कूल में है। वो कहती हैं कि हर सफल लड़की के पीछे उसका पूरा परिवार होता है। जब उन्होंने गांव की स्कूल में अव्वल आना शुरू किया था, तब तक तो कम ही लड़कियां थी, जो स्कूल जा पाती थीं। लेकिन उन्हें सफल होते देख, लोगों ने अपनी बेटियों पर भरोसा जताना सीख लिया और गांव की हर लड़की अब स्कूल जाती है और उनकी तरह ही बनने का सपना देखती है।
Published on:
03 Sept 2019 04:43 pm
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