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50 साल पुराने अलवर के कलाकंद को मिलेगी अंतरराष्ट्रीय पहचान, मिलेगा कॉपीराइट!

जिला कलक्टर ने प्रयास कर उद्यम प्रोत्साहन संस्थान जयपुर के माध्यम से कराया आवेदन, जीआई जनरल में प्रकाशित होने पर आपत्ति नहीं आई तो मिलेगा जीआइ टैग

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50 साल पुराने अलवर के कलाकंद को मिलेगी अंतरराष्ट्रीय पहचान, मिलेगा कॉपीराइट!

50 साल पुराने अलवर के कलाकंद को मिलेगी अंतरराष्ट्रीय पहचान, मिलेगा कॉपीराइट!

जयपुर। देश व प्रदेश के व्यंजनों में अपनी खास पहचान रखने वाले अलवर के कलाकंद (Alwar Kalakand) काे राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दिलाने के लिए जिला कलक्टर ने जीआई टैग (GI tag) दिलाने के प्रयास शुरू किए हैं। इसके लिए उद्यम प्रोत्साहन संस्थान जयपुर के माध्यम से कमिश्नर उद्योग विभाग को आवेदन किया गया है। अब चेन्नई भेजा जाएगा, किसी की ओर से आपत्ति दर्ज नहीं कराई गई तो जल्द ही अलवर के कलाकंद को जीआई टैग मिल सकेगा। जिला प्रशासन पूरी प्रक्रिया का फॉलोअप करेगा।

क्या है जीआइ टैग

जीआई टैग (GI tag) किसी भी उत्पाद की भौगोलिक विशिष्टता को मान्यता देता है। जीआई टैग का शाब्दिक अर्थ जियोग्राफिकल इंडिकेशन यानि भौगोलिक संकेतक। जीआई टैग (GI tag) से मालूम होता है कि प्रोडक्ट किस जगह का है। यानि यह टैग ही प्रोडक्ट की पहचान होते है। इसका इस्तेमाल ऐसे उत्पादों के लिए किया जाता है, जिनका एक विशिष्ट भौगोलिक मूल क्षेत्र होता है।

क्या रहेगी प्रक्रिया

उद्यम प्रोत्साहन संस्थान जयपुर की ओर से अलवर के कलाकंद (Alwar Kalakand) काे जीआई टैग दिलाने के लिए चेन्नई में आवेदन किया गया है। चेन्नई जियोग्राफिकल इंडक्शन रजिस्ट्री इंटेक्चुएल प्रोपर्टी इंडिया में रजिस्ट्रेशन होने के बाद इस आवेदन पर जन सुनवाई का अवसर दिया जाएगा। वहीं जिला प्रशासन की ओर से अलवर के कलाकंद को जीआई टैग दिलाने के लिए पक्ष रखा जाएगा। अलवर प्रशासन के पक्ष काे स्वीकार करने के बाद जीआई जनरल में प्रकाशित किया जाएगा। यदि इस प्रक्रिया में किसी की आपत्ति नहीं आई तो अलवर के कलाकंद को जीआई टैग दिया जा सकेगा।

जीआई टैग मिलने का यह होगा लाभ
अलवर के कलाकंद (Alwar Kalakand) को जीआई टैग मिलने का लाभ यह होगा कि कोई और इसका अलवर कलाकंद के नाम से उत्पादन और बेच नहीं सकेगा। यानि अलवर के कलाकंद काे कॉपीराइट मिल सकेगा। इससे अलवर के कलाकंद को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल सकेगी। जीआई टैग का अर्थ बौदि्धक सम्पदा का मार्का मिलना है।

उद्योग विभाग ने तकनीकी कमियां पूरी कराई

अलवर के कलाकंद को जीआई टैग दिलाने के आवेदन कराने में उद्योग विभाग की भूमिका भी रही है। हलवाई एसोसिएशन के माध्यम से आवेदन की पूर्ति कराई गई, वहीं डेयरी प्रबंधन से भी तकनीकी कमी को पूरा कराया गया। आवेदन के साथ अलवर के कलाकंद का इतिहास, उससे जुड़े व्यवसायी एवं प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रोजगार आदि की जानकारी दी गई है।

कहां ज्यादा उत्पादन- अलवर, खैरथल, तिजारा, राजगढ़, थानागाजी

50 साल से ज्यादा पुराना है अलवर का कलाकंद
अलवर का कलाकंद का इतिहास 50 साल से ज्यादा पुराना है। देश की आजादी के बाद अलवर में कलाकंद का उत्पादन होने लगा था। अलवर का गुणवत्तायुक्त दूध, पानी एवं भौगोलिक कारण इसे स्वाष्टि बनाने में कारगर रहे हैं। अलवर का कलाकंद पूरे देश में अपनी पहचान बना चुका है। अलवर से कलाकंद फिलहाल विदेशों तक भी पहूंच रहा है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रयास दिलाने के प्रयास शुरू किए

अलवर के कलाकंद को राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दिलाने के प्रयास शुरू किए गए हैं। अलवर के कलाकंद को जीआई टैग दिलाने की प्रक्रिया शुरू की गई है।
जितेन्द्र कुमार सोनी, जिला कलक्टर अलवर