
हर्षित जैन/जयपुर.विश्व में फैले कोरोना से बचाव के लिए मुंह पर मास्क लगाना और बार-बार हाथ धोने की अपील की जा रही है। लेकिन श्वेतांबर जैन संप्रदाय के तेरापंथी और स्थानकवासी मुंह पर पट्टी रखने की परंपरा काफी पुरानी है। इसे शास्त्रानुसार मुखवस्त्रिका कहते हैं। शहर सहित अन्य जगहों पर प्रवासरत मुनियों ने पत्रिका को बताया कि इसके पीछे मुंह में हवा के जरिए जीव हिंसा रोकने और जीवाणुओं के शरीर में प्रवेश रोकना उद्देश्य है।
इसका पालन न सिर्फ मुनि,साध्वी बल्कि श्रावक-श्राविकाएं बखूबी करते हैं। ताकि बाहरी कीटाणु शरीर के अंदर प्रवेश नहीं कर सके और थूक भी किसी पर न उछलें। 17 वीं सदी में यह परंपरा शुरू हुई।
साध्वी मंगलप्रभा
भगवान महावीर ने कहा अहिंसा सव्वभूयखेमंकरी अर्थात अहिंसा सब जीवों के लिए कल्याणकारी है। इसलिए मुखवस्त्रिका आवश्यक उपकरण है। जिसे मुंह पर बांधने का उद्देश्य हवा यानि वायुकाय के जीवों की हिंसा से सुरक्षा करना है। विज्ञान भी इस बात की पुष्टि करता है। भगवान महावीर का यह सिद्धांत आज भी आउट आफ डेट नहीं बल्कि अप टू डेट है।
मुनि जंबू कुमार, सरदार शहर
जैन मुनि आजीवन अहिंसा की आराधना करते हैं। स्थूल और सूक्ष्म दोनों प्रकारों के जीवों की हिंसा से निवृत्त रहने की साधन करते हैं। मुख्यतया हवा के जीवोंं की हिंसा से मुक्त रहने के लिए जीवनभर मुखवस्त्रिका धारण करते हैं। यह शाश्वत परंपरा है। इससे जीवन में समरसता आती है।
आचार्य कुलचंद्र सूरीश्वर म.सा., बरखेड़ा तीर्थ
जैन धर्म के कई सिद्धांतों की योग्यता का आज पता चल रहा है। भगवान महावीर के अंतिम सूत्र उत्तराध्ययन सूत्रम में भी यह वर्णन है। हवा में काफी सूक्ष्म जीव हैं जो मुख् में प्रवेश कर जाते हैं। जिससे इनकी हत्या का दोष होता है। इसके साथ ही दूसरे व्यक्ति पर थूक आदि न उछले। बचाव के लिए पट्टिका जरूरी है।
Published on:
05 Apr 2020 08:49 pm
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