
Mobile effect
जबलपुर. बच्चे को व्यस्त रखने के लिए माता-पिता उसको मोबाइल थमा देते हैं लेकिन यह बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास पर विपरीत असर डाल रहा है। कई बच्चे गंभीर बीमारियों से ग्रसित हो रहे हैं। हाल ही में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस मेडिकल कॉलेज अस्पताल के मनोचिकित्सा विभाग में ऐसे मामले पहुंचे, जिनमें अलग-अलग उम्र के बच्चों में कुछ मोबाइल कैरेक्टर को ही वास्तविक उन्हें आसपास होने की कल्पना कर बातें करने लगे।
परिवार के सदस्यों से दूरी और कम संवाद से भी हो रही दिक्कत
मेडिकल में बढ़ रहे मामले, मनोचिकित्सक बच्चों को मोबाइल से दूर रखने की दे रहे सलाह
बर्ताव में आ रहा तेजी से बदलाव
गेमिंग एप और इंटरनेट एडिक्शन का शिकार होने वाले बच्चे काफी आक्रामक बर्ताव कर रहे हैं। उनमें सहनशीलता की कमी आ रही है। बच्चे मोबाइल कैरेक्टर को वास्तविक मानते हैं। उनसे ही बातचीत और बाहर जाने पर साथ लेजाने की जिद भी करते हैं।
बच्चों में जुआ की लत भी
कम उम्र के बच्चे मोबाइल के कारण ऑनलाइन जुआ सट्टा जैसे खेलों का भी शिकार हो रहे है। अधिक पॉकिट मनी पाने की चाहत में बच्चे पहले तो परिजनों के मोबाइल वॉलेट का उपयोग करते हैं और फिर रकम हारने के बाद जान देने जैसी कोशिश करते हैं।
गेम के चक्कर में अकाउंट किया खाली
मामला- नौ साल के एक बच्चे को गेमिंग डिसऑर्डर हो गया। वह मां और पिता का फोन उपयोग करता था। गेम में हाईटेक चीजे पाने के लिए उसने उन्हें ऑनलाइन खरीदना शुरू किया। कई अन्य एप भी डाउनलोड कर लिए, जिससे उसके मां और पिता के एकाउंट से रुपए कट गए। महीनों बाद जब स्टेटमेंट निकला, तो इसका पता चला।
ये मामले पहुंच रहे
01 साल से 02 साल के बच्चों में- भाषा का विकास न होना
03 साल से 05 साल तक- कार्टून और मोबाइल कैरेक्टर को रियल समझना
06 से 10 साल तक- इंटरनेट और गेमिंग डिसऑर्डर
बच्चों को यदि मोबाइल दे दिया जाए, तो वह उसे ही रियलटी समझने लगते हैं। बच्चों में यह तरह-तरह के डिसआर्डर पैदा कर रहा है। मोबाइल और इंटरनेट हाइपर एक्टिव, चिड़चिड़ा और आक्रामक भी बना रहा है। यह गंभीर बीमारी के लक्षण भी हो सकते हैं।
- डॉ. ओपी रायचंदानी, मनोचिकित्सक, मेडिकल कॉलेज अस्पताल
Published on:
16 Feb 2024 03:14 pm
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