
दतिया। करण सागर के पास आज भी प्राचीन शनि मंदिर अपना इतिहास बता रहा है। उक्त मंदिर की स्थापना उस वक्त बुंदेली शासक राजा राजमचंद्र की पत्नी महारानी सीता ने की थी जब उनके पति रामचंद्र पर शनि की महादशा चल रही थी। हालांकि जानकारों के मुताबिक राजा धार्मिक प्रवृति के नहीं थे लिहाजा उन्होंने गृह नक्षत्रों को नहीं माना। बाद में उनकी मौत हो गई। आज भी इस मंदिर पर स्थापित मूर्ति की पूजा की जा रही है। शनिवार को शनिश्चरी अमावस्या है।
मान्यता है कि इस दिन शनि देव की पूजा-अर्चना करने से उनकी कृपा बरसती है। इसी के तहत करण सागर के पास स्थित शनि मंदिर पर भी लोगों का आना-जाना रहता है। हालांकि जानकारी के अभाव में यहां भक्तों की भीड़ कम ही रहती है पर जिन्हें यहां के बारे में जानकारी वे न केवल पूजा करते हैं बल्कि नियमित रूप से यहां दान-पुण्य भी करते हैं। इस मंदिर की ओर जिला प्रशासन का ध्यान नहीं है। इसीलिए यहां अन्य मंदिरों की तरह नवनिर्माण कुछ नहीं हो पा रहा । फिलहाल मंदिर की देखरेख शोभा पुरोहित कर रही हैं।
रानी थी धर्म के प्रति आस्थावान
इतिहास के ज्ञाता रवि टाकुर के मुताबिक के मुताबिक करण सागर के पास इस प्राचीन शनि मंदिर की स्थापना राजा दलपत राव के बेटे रामचंद्र राव की पत्नी सीता ने कराई थी। कहा जाता है कि उस वक्त राजा रामचंद्र राव पर शनि की महादशा से बचाव के लिए रानी सीता ने इस मंदिर की स्थापना कराई थी पर रामचंद्र की आस्था धार्मिक क्रियाकलापों में नहीं थी लिहाजा उन्होंने इस ओर ध्यान नहीं दिया और मंदिर की स्थापना 1735 ई में होने के बाद 1736 में रामचंद्र की मौत हो गई थी। इसके 17 साल बाद तक रानी ने दतिया पर शासन किया । हालांकि इस मंदिर को अब दशावतार मंदिर के रूप में इसे जाना जाता है। ठाकुर के मुताबिक राजा रामचंद्र की मृत्यु 72 साल की उम्र में हुई थी। इससे पहले ही उनके बेटे राम सिंह व पोते की मौत उनकी मौत से पहले हो गई थी।
Published on:
18 Nov 2017 12:59 pm
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