
90 करोड़ खर्च, 22 गांव खाली कराए, फिर भी नहीं मिले "गिर के शेर"
ग्वालियर। टूरिस्ट सर्किट के लिहाज से विदेशी पर्यटकों के लिए सबसे मुफीद कूनो-पालपुर अभयारण्य पर लगभग 90 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। अभयारण्य में 134 बीट हैं, जिनमें तैनात 317 अधिकारी- कर्मचारियों पर हर महीने लगभग 79 लाख रुपए वेतन के रूप में खर्च होते हैं, इसके बावजूद गुजरात के गिर से शेर नहीं मिल पाए हैं। गिर के शेरों के लिए लगातार पहल होने के बावजूद केन्द्र और गुजरात सरकार उदासीन रवैया अपनाए हुए है। सूत्र बताते हैं कि दिल्ली-आगरा-जयपुर-मुंबई टूरिस्ट सर्किट के बीच में स्थित कूनो-पालपुर में शेर आने पर यहां विदेशी पर्यटकों की संख्या बढ़ सकती है।
शेरों के लिए इसलिए है सबसे बेहतर कूनो
कूनो अभयारण्य की स्थापना 1981 में हुई थी। 1991 में वन्य जीव संस्थान ने शेरों को बसाने श्योपुर के कूनों को बेहतर बताया गया था। 2003 में शेर लाने के लिए प्रदेश सरकार ने प्रस्ताव बनाकर केन्द्र को भेजा। कूनों में बाढ़-भूकंप का खतरा नहीं है। गिर में बाढ़ आने का खतरा लगातार रहता है। कूनो के जंगलों में पानी और बहुत से अनछुए स्थान हैं, जहां शेर आसानी से घूम सकते हैं। इंडियन वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट देहरादून के विशेषज्ञों ने कूनो को देश में सबसे बेहतर बताते हुए रिपोर्ट में कहा था कि यहां 150 से 200 साल तक कोई समस्या नहीं आ सकती है।
अमेरिका-कनाडा सहित अन्य देशों से पर्यटक औसतन 18 दिन के टूरिस्ट वीजा पर एशिया भ्रमण पर आते हैं। इस टूर में थाइलैंड, श्रीलंका, इंडोनेशिया का भ्रमण भी शामिल रहता है। गिर जाने पर पर्यटकों को अलग से दो से चार दिन का समय निकालना पड़ता है, जबकि श्योपुर आने के लिए अतिरिक्त समय नहीं निकालना पड़ेगा। पर्यटक जयपुर, दिल्ली, आगरा की यात्रा के साथ ही कूनो आ सकते हैं।
अब तक खर्च लगभग 90 करोड़ रुपए, खजाने से निकलते रहे करोड़ों रुपए
सिर्फ तारीखें बढ़ीं
Published on:
23 Jul 2018 01:41 pm
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