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लॉक डाउन ने मजदूरों को कहीं का नहीं छोड़ा

पत्रिका ग्राउंड रिपोर्ट :गांव लौटे मजदूरों के पास नहीं है कोई काममनरेगा योजना दिखाबा व कागजीबाड़े तक सीमित

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लॉक डाउन ने मजदूरों को कहीं का नहीं छोड़ा

लॉक डाउन ने मजदूरों को कहीं का नहीं छोड़ा

गुना. लॉक डाउन का सबसे ज्यादा असर मजदूर वर्ग पर पड़ा है। पहले उसका रोजगार छिना फिर उसे अपने घर तक पहुंचने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी है। कुछ मजदूर तो सैकड़ों किमी पैदल चलकर ही अपने गांव पहुंचे हैं। वहीं कुछ मजदूरों को किराए के लिए उधार तक पैसे लेने पड़े हैं। कुछ राज्य सरकारों ने मजदूरों को अपने जिले से दूसरे जिले तक जाने की अनुमति तो दे दी लेकिन किराया मजदूरों को ही देना पड़ा है। यही नहीं वाहन चालकों ने सिर्फ मजदूरों को एक जिले से दूसरे जिले के बॉर्डर तक ही छोड़ा है। इसके बाद मजदूरों को अपने घर तक पहुंचने के लिए कई किमी पैदल ही चलना पड़ा है। लॉक डाउन से अब तक 5 हजार से अधिक मजदूर देश के अलग-अलग राज्यों से अपने गांव लौट चुके हैं। लेकिन अभी भी सैकड़ों मजदूर हाई रिस्क जोन क्षेत्र मेें फंसे हुए हैं।
पत्रिका टीम ने गुना जिले की बमोरी विधानसभा के फतेहगढ़ व बरसाती गांव में लौटे मजदूरों से बात कर उनकी पीड़ा जानी। साथ ही मनरेगा के तहत मजूदरों को रोजगार देने के दावे की हकीकत भी गांव के लोगों से पूछी। जिसमें सामने आया कि लॉक डाउन के बाद बाहर से लौटे मजदूरों की स्थिति इस समय बेहद खराब है। उन्हें स्थानीय स्तर पर रोजगार नहीं मिल रहा है। जो मजदूर इस समय होम क्वॉरंटीन हैं, उन्हें भी प्रतितिन भोजन की व्यवस्था अपने स्तर ही करनी पड़ रही है। मजदूरों का कहना था कि वे लॉक डाउन के बाद जब अपने गांव लौटे तो फैक्ट्री मालिकों ने उन्हें न तो आखिरी महीने का मेहनताना दिया और न ही किराए के लिए पैसे। जो पैसे बचे थे वह किराया व रास्ते में खाना पीने खर्च हो गए। गांव आने के बाद रोजगार तो क्या, दो जून की रोटी की भी व्यवस्था नहीं है। ग्रामीण अंचल में इस समय निजी निर्माण कार्य भी नहीं चल हैं इसलिए भी काम नहीं मिल पा रहा है। वहीं अधिकांश मजदूर इस समय होम क्वॉरंटीन हैं इसलिए वे कोई छोटा काम भी नहीं कर पा रहे हैं।
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मनरेगा में जरुरत के समय नहीं मिलता पैसा
इस समय शासन प्रशासन मनरेगा के तहत मजदूरों को रोजगार देने की बात कह रही है। लेकिन जमीनी स्तर पर इसकी हकीकत कुछ और है। गांव के सरपंच व मजदूरों ने बताया कि मनरेगा की सबसे बड़ी कमी कम मेहनताना व समय पर पैसा न मिलना है। लॉक डाउन की वजह से बाहर से लौटे मजदूरों की संख्या अधिक हो गई है। जबकि मनरेगा में इतना काम ही नहीं निकल रहा, जिससे सभी को रोजगार मिल सके। वहीं पहली अड़चन जॉब कार्ड न होने की भी आ रही है। जो मजदूर दूसरी जगह 250 से 300 रुपए प्रतिदिन कमाते थे, उन्हें मनरेगा में इससे कम मेहनताना दिया जा रहा है। यही नहीं यह पैसा भी उन्हें तत्काल न मिलकर कम से कम 15 दिन बाद मिल सकेगा। जबकि मजदूरों को पैसे की जरुरत इस समय सबसे ज्यादा है।
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मजदूरों की परेशानी उनकी जुबानी
मैं गुजरात की टाइल्स फैक्ट्री में मुनीम था। वहां मुझे महीने के 10 से 15 हजार रुपए मिल जाते थे लेकिन गांव में किसी तरह का कोई रोजगार नहीं है।
कमल सिंह वर्मा, मजदूर
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मैं गुजरात में एक फैक्ट्री में काम करता था। लॉक डाउन के बाद सरकार ने एमपी बॉर्डर तक वाहन से छुड़वा दिया लेकिन 1500 रुपए किराया मुझे ही देना पड़ा। रास्ते में खाने पीने में बचे खुचे पैसे भी खर्च हो गए।
नारायण लाल नायक, मजदूर
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मैं राजस्थान के भीलबाड़ा जिले मेें मजदूरी करता था। काफी दिन तक वहां फंसा रहा। सेठ ने आखिरी महीने के भी पैसे नहीं दिए। मजबूरी में पैदल ही गांव तक आना पड़ा है। यहां भी कोई रोजगार नहीं है। गांव में ही आसपास मांगकर खाना खाना पड़ रहा है।
कैलाश ओड़, मजदूर