23 जनवरी 2026,

शुक्रवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

सावन में शिव की पूजा करते समय भूलकर भी ना करें ऐसी गलती, नहीं तो..

शिव पूजा में भूलकर भी ना करें ऐसी गलती, नहीं तो..

3 min read
Google source verification

image

Shyam Kishor

Aug 10, 2018

Shiv Pooja In Sawan

सावन में शिव की पूजा करते समय भूलकर भी ना करें ऐसी गलती, नहीं तो..

सावन मास में शिव भक्त भोले भंडारी की पूजा अर्चना बड़ी श्रद्धा के साथ करते हैं, शिव पूजा को शिव की सेवा भी कहा जाता हैं । सेवा शब्द अत्यन्त व्यापक है इसमें प्राणिमात्र की सेवा से लेकर परमात्मा की पूजा तक ‘सेवा’ कहलाती है । भगवान की सेवा का अत्यन्त गहन अर्थ है, भगवान की सेवा या भगवत्सेवा शब्द मिठास और रस से पूर्ण है, इसका अर्थ सेव्य (आराध्य) में लीन या एकरस हो जाना हैं ।

भगवान की सेवा में जीब के माध्यम से ईश्वर नाम का जप-कीर्तन किया जाता है, कानों से कथा सुनना, नेत्रों से भगवान की छवि का दर्शन कर हृदय में उसे स्थापित करना, हाथों से भगवान के विग्रह की चरण सेवा करना, अंगों में गंध आदि लगाना, माला बनाना, धारण कराना, नैवेद्य अर्पित करना तथा चरणों से उनके तीर्थो की यात्रा करना व शरीर से उन्हें नाचकर रिझाना आदि कार्य सेवा या पूजा के अंतर्गत आते हैं ।

ऐसा हो शिव का सेवक
जिसके हृदय में सदा शान्ति, मुख पर प्रसन्नता व चरित्र शीशे के समान निर्मल हो, जिसके एकमात्र आधार भगवान हों और जिसके जीवन का लक्ष्य परमात्मा शिव की प्राप्ति हो वही सच्चा सेवक कहलाता है ।

ईश्वर के विशेष प्रतिनिधि ऋषियों व संतों का आदेश है—‘नीचे बनो’ अर्थात् अपने को सबसे दीन-हीन मानकर सबको आदर-सम्मान देने वाला मनुष्य परम पिता भगवान को बहुत प्रिय होता है । सेवा में अभिमान और स्वार्थ साधक के सारे पुरुषार्थ को मिट्टी में मिला देता है ।

सेवा में हृदय का भाव ही प्रमुख हैं
शिवजी की सेवा में भाव मधुर रहने पर ही सेवा मधुर होती है । किसी के प्रति भी मन में कटुता का भाव रहने पर सेवा भी कटु हो जाती है क्योंकि भगवान की सेवा भाव है क्रिया नहीं । मन की कटुता शरीर के रोम-रोम को अपने रंग में रंग देती है जिससे भगवान की सेवा भी कटु हो जाती है । साधक को अपनी सेवा-पूजा की किसी दूसरे की सेवा से कभी तुलना नहीं करनी चाहिए । क्योंकि वह सेवा नहीं बल्कि सेवा में स्वार्थ व अहंकार का ताण्डव नृत्य करते हैं ।

भगवत्सेवा करते समय रखें इन बातों का ध्यान

भगवत्सेवा के कुछ नियम हैं जिन्हें प्रत्येक साधक को जीवन में अपनाना चाहिए, जो इन बातों को नहीं मानता वह न भक्त है और ही सेवक । जब भी शिवजी की सेवा करते तो उस समय साधक को इन गलतियों को भुलकर भी नहीं करना चाहिए, शास्त्रानुसार ऐसा करना सेवा अपराध की श्रेणी में आता है ।

1- भगवान की मूर्ति के सामने अशौच अवस्था (जन्म और मरण के सूतक में) नहीं जाना चाहिए ।
2- भगवान की मूर्ति के सामने बिना नहाये और दांत साफ किए बिना नहीं जाना चाहिए ।
3- मैले और बिना धुले वस्त्र और दूसरे के वस्त्र पहनकर भगवान की मूर्ति या चित्र को छूना नहीं चाहिए ।
4- रजस्वला स्त्री को छूकर भगवान की मूर्ति को छूना भी अपराध माना गया है ।
5- तेलमालिश करके बिना नहाये भगवान की मूर्ति को स्पर्श नहीं करना चाहिए ।


6- भगवान की मूर्ति के सामने पैर पसार कर एवं पीठ करके भी नहीं बैठना चाहिए ।
8- भगवान की मूर्ति के सामने घुटनों को ऊंचा करके हाथ से लपेटकर नहीं बैठना चाहिए । भगवान की मूर्ति को एक हाथ से प्रणाम नहीं करना चाहिए ।
9- भगवान की मूर्ति के सामने झूठ नहीं बोलना चाहिए । एवं किसी अन्य देवता या किसी भक्त की निन्दा नहीं करनी चाहिए ।
10- भगवान की मूर्ति के सामने कम्बल से सारा शरीर ढक कर नहीं जाना चाहिए ।


11 भगवान की मूर्ति के सामने जोर से बोलना एवं भोजन नहीं करना चाहिए ।

12- भगवान की मूर्ति के सामने सोना नहीं चाहिए ।
13 गुटका, पान या पानमसाला खाते हुए या मांसाहार करने के बाद भगवान की पूजा-सेवा नहीं करनी चाहिए ।

14- पूजा करते समय यदि लघुशंका के लिए जाना पड़ जाए तो हाथ-पैर अच्छे से धोकर कुल्ला करके ही पूजा करनी चाहिए ।
15- पूजा के समय यदि मलत्याग (शौच) के लिए जाना पड़े तो पुन: स्नान करके ही पूजा करनी चाहिए ।


16- दीपक जलाने के बाद हाथ धोकर ही भगवान को स्पर्श करें ।
17- भगवान को चन्दन, रोली, पुष्प चढ़ाने से पहले धूप-अगरबत्ती नहीं दिखानी चाहिए ।
18- पुष्पों को धोकर भगवान के विग्रह पर न चढ़ाएं । केवल जल का छींटा देकर ही उन्हें शुद्ध करना चाहिए ।