1- वीरभद्र अवतार – भगवान शिव का यह अवतार तब हुआ था, जब दक्ष द्वारा आयोजित यज्ञ में माता सती ने अपनी देह का त्याग किया था । माता सती के देह त्यागने से क्रोधित शिव ने अपने सिर से एक जटा उखाड़ने पर उससे महाभंयकर वीरभद्र प्रगट हुए, शिवजी के इसी अवतार ने दक्ष के यज्ञ का विध्वंस कर दक्ष का सिर काटकर उसे मृत्युदंड दिया ।
2- पिप्पलाद अवतार – शिवदी का पिप्पलाद अवतार मनुष्य के जीवन में बड़ा महत्व रखता हैं, कहा जाता है कि शनि पीड़ा का निवारण पिप्पलाद की कृपा से ही संभव माना गया है । पिप्पलाद जी का स्मरण करने मात्र से शनि की पीड़ा दूर हो जाती है । शिव महापुराण के अनुसार स्वयं ब्रह्मा ने ही शिव के इस अवतार का नामकरण किया था ।
3- नंदी अवतार – भगवान शंकर सभी जीवों का प्रतिनिधित्व करते हैं, इसलिए नंदीश्वर अवतार भी शिव स्वरूप सभी जीवों से प्रेम का संदेश देता है । नंदी (बैल) कर्म का प्रतीक है, जिसका अर्थ है कर्म ही जीवन का मूल मंत्र है ।
4- भैरव अवतार – श्री शिव महापुराण में भैरव को भगवान शंकर जी का पूर्ण रूप बताया गया है । परम पवित्र काशी में भैरव को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिली । काशीवासियों के लिए भैरव की भक्ति अनिवार्य बताई गई है ।
5- अश्वत्थामा – महाभारत के अनुसार पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा काल, क्रोध, यम व भगवान शंकर के अंशावतार थे । आचार्य द्रोण ने भगवान शंकर को पुत्र रूप में पाने की लिए घोर तपस्या की थी और भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया था कि वे उनके पुत्र के रूप मे अवतरित होंगे । शिवमहापुराण (शतरुद्रसंहिता-37) के अनुसार अश्वत्थामा आज भी जीवित हैं और वे धरती पर गंगा के किनारे निवास करते हैं किंतु उनका निवास कहां हैं, यह नहीं बताया गया है । ऐसी मान्यता हैं कि मध्यप्रदेश में खंडवा – बुरहानपुर मार्ग के बीच असीरगड़ किले में स्थित शिवमंदिर मे प्रत्येक पूर्णिमा की रात्रि अश्वत्थामा आते हैं, जिसे कुछ स्थानीय लोगों ने देखा भी है ।
6- शरभावतार – शरभावतार में भगवान शंकर का स्वरूप आधा मृग तथा शेष शरभ पक्षी (पुराणों में वर्णित आठ पैरों वाला जंतु जो शेर से भी शक्तिशाली था) का था । इस अवतार में शिवजी ने नृसिंह भगवान की क्रोधाग्नि को शांत किया थान।
7- गृहपति अवतार – भगवान शंकर का सातवां अवतार है गृहपति । जिनका अवतार नर्मदा नदी के तट पर धर्मपुर नाम का एक नगर में हुआ था ।
8- ऋषि दुर्वासा – भगवान शंकर के विभिन्न अवतारों में ऋषि दुर्वासा का अवतार भी प्रमुख है, रुद्र के अंश से मुनिवर दुर्वासा ने जन्म लिया अंहकारी आतताईयों इस धरा की रक्षी की ।
9- हनुमान – भगवान शिव का हनुमान अवतार सभी अवतारों में श्रेष्ठ माना गया है, इस अवतार में भगवान शंकर ने एक वानर का रूप धरा था ।
10- वृषभ अवतार- भगवान शंकर ने विशेष परिस्थितियों में वृषभ अवतार लिया था, इस अवतार में भगवान शंकर ने विष्णु पुत्रों का संहार किया था ।
11- यतिनाथ अवतार -भगवान शंकर ने यतिनाथ अवतार लेकर अतिथि के महत्व का प्रतिपादन किया था । उन्होंने इस अवतार में अतिथि बनकर भील दम्पत्ति की परीक्षा ली थी, जिसके कारण भील दम्पत्ति को अपने प्राण गवाने पड़े।
12- कृष्णदर्शन अवतार – भगवान शिव ने इस अवतार में यज्ञ आदि धार्मिक कार्यों के महत्व को बताया है, इसलिए यह अवतार पूर्णत: धर्म का प्रतीक है ।
13- अवधूत अवतार – भगवान शंकर ने अवधूत अवतार लेकर इंद्र के अंहकार को चूर किया था ।
14- भिक्षुवर्य अवतार – भगवान शंकर तो स्वयं देवों के देव हैं, संसार में जन्म लेने वाले हर प्राणी के जीवन के रक्षक भी हैं। भगवान शंकर का भिक्षुवर्य अवतार यही संदेश देता है ।
15- सुरेश्वर अवतार – भगवान शंकर का सुरेश्वर (इंद्र) अवतार भक्त के प्रति उनकी प्रेमभावना को प्रदर्शित करता है । इस अवतार में भगवान शंकर ने एक छोटे से बालक उपमन्यु की भक्ति से प्रसन्न होकर उसे अपनी परम भक्ति और अमर पद का वरदान दिया ।
16- किरात अवतार – किरात अवतार में भगवान शंकर ने पाण्डुपुत्र अर्जुन की वीरता की परीक्षा ली थी । वनवास के दौरान अर्जुन ने भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी । अर्जुन की वीरता देख भगवान शिव प्रसन्न हो गए और अपने वास्तविक स्वरूप में आकर अर्जुन को कौरवों पर विजय का आशीर्वाद दिया ।
17- सुनटनर्तक अवतार – पार्वती के पिता हिमाचल से उनकी पुत्री का हाथ मागंने के लिए शिवजी ने सुनटनर्तक वेष धारण किया था ।
18- ब्रह्मचारी अवतार – दक्ष के यज्ञ में प्राण त्यागने के बाद जब सती ने हिमालय के घर जन्म लिया तो शिवजी को पति रूप में पाने के लिए घोर तप किया । पार्वती की परीक्षा लेने के लिए शिवजी ब्रह्मचारी का वेष धारण कर उनके पास पहुंचे। पार्वती ने ब्रह्मचारी को देख उनकी विधिवत पूजा की ।
19- यक्ष अवतार – यक्ष अवतार शिवजी ने देवताओं के अनुचित और मिथ्या अभिमान को दूर करने के लिए धारण किया था ।