
परीक्षा के समय विद्यार्थी हर मुमकिन कोशिश करते हैं कि वे पास हो जाएं, चाहे तैयारी पूरी हो या नहीं। लेकिन जब उत्तर लिखने के लिए कलम नहीं चलती, तो दिल से निकले शब्द पन्नों पर आ जाते हैं। छिंदवाड़ा जिले के मूल्यांकन केंद्र में जांच के लिए आई उत्तरपुस्तिकाएं इस बार सिर्फ अकादमिक जवाबों से नहीं, बल्कि विद्यार्थियों की भावनात्मक अपीलों से भी भरी हुई हैं। कुछ विद्यार्थियों ने उत्तर के बजाय परीक्षक से मदद की गुहार लगाई है, जैसे, मैडम या सर, मुझे अपनी बेटी समझकर पास कर दीजिए। तो किसी ने लिखा, मेरी सगाई हो चुकी है, अगर फेल हो गई तो रिश्ता टूट जाएगा, कृपया पास कर दीजिए।
कुछ विद्यार्थियों ने कॉपी में 200 और 500 के नोट तक रख दिए हैं और साथ में संदेश भी, मुझे अपना बेटा समझिए और पास कर दीजिए, भगवान भला करेगा। कोई भगवान की कसम देकर भावनात्मक दबाव बना रहा है, तो कोई पाप लगने की चेतावनी दे रहा है। इन भावनात्मक अपीलों को देखकर परीक्षकों की एक पल के लिए हंसी छूट जाती है, पर मूल्यांकन में वे पूरी तरह निष्पक्ष रहते हैं। कॉपियों में लिखे संदेश उनकी निजी या पेशेवर संवेदनाओं को प्रभावित नहीं करते। एक परीक्षक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि ऐसे संदेश हर साल आते हैं, ये बच्चों का डर और दबाव दर्शाते हैं। लेकिन हम सिर्फ उत्तरों के आधार पर ही नंबर देते हैं। परीक्षकों के अनुसार, ये विद्यार्थी अक्सर बहुत मामूली अंकों से पास होने से चूकते हैं।
अगर वे थोड़ा और प्रयास करते तो आसानी से 33 प्रतिशत अंक पा सकते थे। लेकिन शायद आत्मविश्वास की कमी और परीक्षा का तनाव उन्हें इस मोड़ तक ले आता है, जहां वे कॉपी में भावना और डर के जरिए परिणाम बदलवाना चाहते हैं। इन अपीलों को केवल मजाक या निरीहता की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए। यह हमारे शिक्षा तंत्र, पारिवारिक दबाव और सामाजिक अपेक्षाओं की भी एक झलक है। विद्यार्थियों को यह समझाने की जरूरत है कि जीवन में एक परीक्षा की हार कोई अंत नहीं होती, और पास-फेल से बड़ा होता है सीखना।
Published on:
09 Apr 2025 06:46 pm
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