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गोटमार मेले में 250 से अधिक घायल, आज तक 16 लोग गंवा चुके हैं जान, देखें VIDEO

धारा 144 के बावजूद हजारों युवा पथराव करने नदी में उतरे, घायलों के लिए बनाए गए थे कैंप...।

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जितेंद्र अतकरे की रिपोर्ट

छिंदवाड़ा। जिले के पांढुर्ना (pandhurna) में विश्व प्रसिद्ध गोटमार मेले (gotmar mela) में शनिवार को दो गांवों के बीच में भारी पथराव (stone pelting) हुआ। नदी के बीच में लगा झंडा हासिल करने को लेकर दोनों गांवों के बीच में खूनी संघर्ष शाम तक चलता रहा। 3.38 मिनट पर एक पक्ष के लोगों ने झंडे को तोड़ दिया। जबकि दूसरे पक्ष के लोग उस झंडे को नहीं ले जाने दे रहे हैं। इसे रोकने के लिए भी जमकर पथराव हुआ। करीब 300 सालों से इस मेले की परंपरा चली आ रही है।

शनिवार को सुबह 11 बजे इस मेले की शुरुआत हुई। परंपरागत इस मेले में हर साल लोग घायल होते हैं। कई लोगों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ता है। यहां तक कि आज तक इस मेले में 16 लोगों की जान भी जा चुकी है। इसके बावजूद भी यहां इस मेले को मनाने की परंपरा है।

यहां देखें VIDEO

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250 घायल, एक दर्जन रैफर

दिनभर चले इस मेले में शाम तक 250 से अधिक युवाओं के घायल होने के समाचार हैं, वहीं एक दर्जन से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हो गए हैं। जिन्हें नागपुर रैफर किया गया है। हालांकि कुछ घायलों का इलाज पास ही में प्रशासन की ओर से बनाए मेडिकल कैंप में कर दिया गया।

खूनी खेल को रोकने के प्रयास सफल नहीं हुए

खूनी खेल को रोकने के लिए कई जिला कलेक्टरों ने प्रयास भी किए। वर्ष 1998 में तत्कालीन कलेक्टर मलय श्रीवास्तव ने गोटमार स्थल पर रबर की गेंदें डाली थीं, लेकिन लोग गेंद अपने घर ले गए और पत्थरों से ही गोटमार खेली। वर्ष 2008 में कलेक्टर निकुंज श्रीवास्तव ने स्वरूप बदलने के लिए खेल स्थल पर सांस्कृतिक आयोजन कराया, लेकिन भीड़ ने आक्रोशित होकर पुलिस और प्रशासन पर ही पथराव कर दिया था। गोटमार स्थल से अधिकारियों को भागना पड़ा था।

अब तक 16 लोगों की हो चुकी है मौत

इस खूनी खेल में अब तक 16 लोग अपनी जान गवा चुके हैं। आज भी गोटमार का खेल नजदीक आते ही मृतकों के परिवार वाले सिहर उठते हैं। इसी तरह गोटमार खेलने वालों के परिवारों की जान सांसत में बनी रहती है।

क्यों होता है गोटमार

गोटमार मेले का इतिहास 300 साल पुराना बताया जाता है। जाम नदी के दोनों ओर के लोगों के बीच खेले जाने वाले इस खूनी खेल के पीछे एक प्रेम कहानी जुडी हुई है। पांढुर्ना का एक लड़का नदी के दूसरे छोर पर बसे गांव की एक लड़की से प्यार करता था। उनकी इस प्रेमकहानी पर दोनों गांवों के लोगों को एतराज था।

एक दिन सभी के विरोध को झेलते हुए लड़का लड़की को गांव से भागकर लौट रहा था। अभी दोनों ने आधी नदी तक का ही सफर किया था कि दोनों ओर के ग्रामीणों को इसकी सूचना मिल गई और प्रेमीजोड़े पर दोनों तरफ से पत्थरों की बरसात होने लगी। इस पथराव में दोनों की मौत नदी के मझधार में हो गई।