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खजुराहो नृत्य महोत्सव: शिव और राम के गुणगान ने घोला भक्तिरस, जीवंत हो उठा राधा कृष्ण का पहला प्रेम मिलन

महोत्सव के तीसरे दिन नृत्यों से बरसे बसंत और फागुन के रंग

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प्रस्तुति देते कलाकार

प्रस्तुति देते कलाकार

छतरपुर. 50 वें खजुराहो समारोह के तीसरे दिन नृत्यांगनाओं ने मंच पर बसंत,होली और जीवन की अनुभूतियों रे रंग विखेरे। साक्षी शर्मा से लेकर कस्तूरी पटवर्धन, विद्या प्रदीप और पद्मश्री पुरु दाधीचि के नृत्य से बसंत व फागुन के रंग में दर्शक भी भींगकर भावविभोर हो गए।

रंगीला शंभू गौरा ले पधारो
तीसरे दिन बुधवार को समारोह की शुरुआत दिल्ली की साक्षी शर्मा के एकल कथक नृत्य से हुई। जयपुर घराने से ताल्लुक रखने वाली साक्षी ने शिव स्तुति से अपने नृत्य का शुभारंभ किया। दादरा में निबद्ध राग पीलू के सुरों में पगी राजस्थानी लोक रचना रंगीला शंभू गौरा ले पधारो प्यारो पावना पर नृत्य भावों से साक्षी ने भक्ति रस का प्रवाह किया। अगली प्रस्तुति में उन्होंने तीनताल पर शुद्ध नृत्य की प्रस्तुति दी। इसमें उन्होंने उपज से शुरू करके कुछ ठाठ ,उठान, परनें, तिहाइयां आदि की प्रस्तुति दी। ठुमरी लचक लचक चलत चाल पर उन्होंने बड़े ही सहज ढंग से भाव पेश किए और अंत में तीनताल में कुछ बंदीशो की मनोहारी प्रस्तुति के साथ एवं गत निकास के साथ पैरों का काम भी दिखाया।

शिव पंचाक्षर स्त्रोत से जगी भक्ति भावना
दूसरी प्रस्तुति में कस्तूरी पटनायक और कलाकारों ने महारी और ओडिसी नृत्य की प्रस्तुति दी। मंगलाचरण में उन्होंने रामाष्टकम स्त्रोत कृत्रत देव वंदनम पर नृत्य कर भक्ति रस घोल दिया। इस प्रस्तुति में कस्तूरी ने राम की महिमा पर अच्छे नृत भाव किए। इसके बाद समूह में शामिल कलाकारों ने पल्लवी यानी शुद्ध नृत्य पेश किया। अगली पेशकश में कस्तूरी ने अपनी छह साथियों के साथ शिव पंचाक्षर स्त्रोत - नागेंद्र हराय त्रिलोचनाय पर नृत्य कर शिव को साकार करने की कोशिश की। इसके पश्चात कस्तूरी ने बंशी तेजी हेला शंख चक्र हस्त गीत पर उड़ीसा का पारंपरिक महरी नृत्य पेश किया। नृत्य का समापन उन्होंने मणि विमाने गोविंदा रचना पर नृत्याभिनय से किया।

नृत्य के जरिए किया छह ऋतओं का वर्णन
तीसरी प्रस्तुति में केरल की विद्या प्रदीप का लास्य से भरा मोहिनीअट्टम नृत्य की प्रस्तुति दी। चोलकेट्टू से अपने नृत्य का शुभारंभ किया। इसमे उन्होंने लास्यपूर्ण ढंग से मंगलाचरण किया। त्रिपुट ताल की यह रचना रसिकों को मुग्ध कर गई। इसके बाद उन्होंने पदवर्णम की प्रस्तुति दी। आधिताल और राग मुखारी की यह रचना महाराजा स्वतिर्णाल द्वारा संयोजित की गई थी। नृत्य का समापन उन्होंने जयदेवकृत गीत गोविंद के पद से किया। इसमें उन्होंने राधा कृष्ण के पहले मिलन का बड़े ही भाव प्रवण ढंग से वर्णन किया।
सभा का समापन पद्मश्री पंडित पुरु दाधीच और उनके समूह के कथक नृत्य से हुआ। उन्होंने ऋतु गीतम की मनोहारी प्रस्तुति दी। इस प्रस्तुति में उन्होंने छह ऋतुओं का नृत्याभिनय से वर्णन किया। राग भूप कल्याण सारंग से लेकर बसंत बहार मल्हार और ध्रुपद खयाल ठुमरी से लेकर तमाम सांगीतिक चीजों से सजी यह प्रस्तुति खूब पसंद की गई।