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कविता बाहर एवं भीतर के लोकतंत्र की खरी अभिव्यक्ति

कविता (Poetry) तो बाहर एवं भीतर के लोकतंत्र की खरी अभिव्यक्ति है। भले ही कवि अकेले कविता की रचना करता हैं लेकिन उसमें सामाजिक सरोकार इतने गहरे होते हैं कि वह समाज की लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति बन जाती है। वरिष्ठ साहित्यकार बी.एल. आच्छा (aachha) ने यह बात कही।

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Poetry competition Sur-Lahari

Poetry competition Sur-Lahari

चेन्नई. कविता तो बाहर एवं भीतर के लोकतंत्र की खरी अभिव्यक्ति है। भले ही कवि अकेले कविता की रचना करता हैं लेकिन उसमें सामाजिक सरोकार इतने गहरे होते हैं कि वह समाज की लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति बन जाती है।
वरिष्ठ साहित्यकार बी.एल. आच्छा ने यह बात कही। वे शुक्रवार को दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा मद्रास के उच्च शिक्षा एवं शोध संस्थान के तत्वावधान में सभा प्रांगण में अंतर महाविद्यालयीन कविता पाठ प्रतियोगिता सुर-लहरी 2020 का उद्घाटन करने के बाद आयोजित समारोह को संबोधित कर रहे थे।
इस अवसर पर आच्छा ने कहा कि चाहे भीतर की तपन हो, अत्याचारों की कसक हो या उल्लास के रंग। जब वे कविता के भीतर से फूटते हैं तो पाठक को लगता हैं कि हमारे लम्हों की जीवंत व्यथा है। कविता करोड़ों लोगों की आजाद अभिव्यक्ति है। करोड़ों लोगों की कसक को जीने वाला कवि चुप नहीं रह सकता। आच्छा ने कहा कि ऐसी प्रतियोगिता न केवल विद्यार्थियों में सृजन के संस्कार रचती हैं बल्कि जिंदगी के सपनों के लिए जज्बाती सपनों के तेवर भी दिखाती है। जिंदगी को केवल गणित से नहीं चलाया जा सकता, अगर जज्बात हैं, भीतर की तपिश हैं, और सपनों को साकार करने वाली जीवट हैं तो सामाजिक बदलाव को कोई रोक नहीं सकता।
जीवन में क्रिएटिव आर्ट जरूरी
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के कुलपति डॉ. षोड्षी मोहन ने कहा कि जीवन में क्रिएटिव आर्ट जरूरी है। काव्य पाठ सरीखी प्रतियोगिताएं निसंदेह हमारी रचनात्मक गतिविधियों को बढ़ावा देने में मददगार बन सकती है। समारोह के विशिष्ट अतिथि प्रचार सभा के कुलसचिव प्रो. प्रदीप के. शर्मा ने कहा कि हर व्यक्ति में कुछ न कुछ हूनर जरूर होता है। जरूरत है उस हूनर को निखारने की।
प्रतिभा निखारने के उद्देश्य से सुर लहरी
प्रचार सभा के उच्च शिक्षा एवं शोध संस्थान की विभागाध्यक्ष एवं कार्यक्रम की संयोजक प्रोफेसर डॉ. अमर ज्योति ने कहा कि हर साल छात्रों की प्रतिभा निखारने के उद्देश्य से सुर लहरी का आयोजन किया जा रहा है। विद्यार्थी शैक्षणिक के साथ ही रचनात्मक गतिविधियों में भी हिस्सा लें, इससे टैलेन्ट निखर सकेगा। प्रचार सभा लोगों को हिंदी सिखाने के साथ ही उन्हें हिंदी में दक्ष बना रही है। दक्षिण में हिंदी के प्रचार-प्रसार में सभा की अहम भूमिका रही है। इस अवसर पर रीडर डॉ. नजीम बेगम, सहायक प्रोफेसर डॉ. सविता धुड़केवार, सहायक प्रोफेसर डॉ. बी. संतोषी, सहायक प्रोफेसर डॉ. एन. जयश्री व सहायक प्रोफेसर डॉ. जयलक्ष्मी मौजूद थीं।
अभी तक जो देखा जो सुना सहती रही...
इस अवसर पर विभिन्न महाविद्यालयों के छात्र-छात्राओं ने कविताएं प्रस्तुत कीं। भरत कुमार ने भारत मेरा मंदिर हैं मैं इसका पुजारी हूं...., दिव्या द्विवेदी ने अभी तक जो देखा जो सुना सहती रही...,समेत अन्य कविताएं पेश कीं। छात्रा वर्ग में पी साईं प्रथम व प्रज्ञा द्वितीय रही। छात्र वर्ग में भरत कुमार प्रथम व पी. सेठ द्वितीय रहे। विजेताओं को पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया। प्रतियोगिता में भाग लेने वाले सभी प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र दिए गए। प्रचार सभा के जनसंपर्क अधिकारी एवं गीतकार ईश्वर करूण तथा डॉ. श्रीधरन निर्णायक के रूप में उपस्थित थे। दीप प्रज्ज्वलन एवं प्रार्थना के साथ प्रतियोगिता की शुरुआत की गई। शॉल ओढ़ाकर एवं गुलदस्ता भेंट कर अतितियों का स्वागत किया गया।