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pachmarhi tourism news- जब भी पहाड़ों पर जाने का मन करता है तो हमारे सामने हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की तस्वीरें सामने आ जाती है, लेकिन मध्यप्रदेश का पचमढ़ी भी किसी हिमाचल और उत्तराखंड से कम नहीं है। सतपुड़ा के हरे-भरे घने जंगलों और पहाड़ों से घिरी पचमढ़ी 'सतपुड़ा की रानी' भी कहा जाता है। सतपुड़ा के जंगल दुनियाभर में इसलिए भी जाने जाते हैं क्योंकि यहां सतपुड़ा टाइगर रिजर्व होने के साथ ही जंगल सफारी भी होती है। साथ ही मध्यप्रदेश की सबसे ऊंची चोटी भी यहीं है। तो आप भी घूम आइए पचमढ़ी की वादियों में...।
patrika.com पर हम आपको बता रहे हैं मध्यप्रदेश के इस खूबसूरत हिल स्टेशन के बारे में जहां आप एक बार नहीं बार-बार घूमने जा सकते हैं।
वैसे तो पचमढ़ी जाने के लिए पूरे साल कभी भी जा सकते हैं। लेकिन, सर्दियों में और मानसून में यहां की खूबसूरती और बढ़ जाती है। सर्दियों में यहां ठंड अधिक पड़ती है, यहां मध्यप्रदेश के बाकी जिलों से पांच डिग्री कम तापमान होता है। यहां 1 डिग्री से नीचे तापमान चले जाता है, जबकि गर्मी के मौसम में भी थोड़ी ठंडक होने के कारण यहां पर्यटकों की भीड़ उमड़ पड़ती है।
धूपगढ़
सतपुड़ा रेंज का यह सबसे ऊंचा स्थान है धूपगढ़। यह 1352 मीटर ऊंचाई पर स्थित है। धूपगढ़ चोटी मध्यप्रदेश के सबसे ऊंची चोटी भी है। इस स्थान से सनराइज और सनसेट देखने के लिए बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं। यहां पर पहुंचने के लिए कठिन पहाड़ी रास्ता होने के कारण प्राइवेट वाहन नहीं ले जा सकते, यहां पर जाने के लिए वन विभाग की जिप्सी में ही जाने की अनुमति मिलती है। इसके अलावा कई लोग यहां ट्रैकिंग करके या पैदल भी पहुंच जाते हैं।
हांडी खोह
पचमढ़ी में तीन तरफ से पहाड़ों से घिरी 300 फीट गहरी खाई है। यह खाई इतनी गहरी है कि इसका तल भी नजर नहीं आता है। इसे हांडी खोह नाम से जाना जाता है। घने जंगलों से घिरे हांडी खोह से पौराणिक कहानियाँ भी जुड़ी हैं। माना जाता है कि एक समय यह एक विशाल झील थी, लेकिन झील की रक्षा करने वाला शैतान सांप, भगवान शिव के क्रोध से नष्ट हो गया और इस घटना ने झील को सुखाकर एक छोटे बर्तन (हांडी) में बदल दिया।
राजेंद्र गिरी सनसेट प्वाइंट
राजेंद्रगिरी सनसेट प्वाइंट पचमढ़ी का एक लोकप्रिय स्थान है। इसका नाम भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के नाम पर रखा गया था। क्योंकि वे अक्सर पचमढ़ी आते रहते थे। यहां से डूबते सूरज का नजारा देखते ही बनता है। इसी पहाड़ी से प्रकृति का सौंदर्य देखने के लिए बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं।
चौरागढ़
1250 सीढ़ियां चढ़कर इस स्थान पर पहुंचा जा सकता है। जहां पर शिवजी का भव्य मंदिर है, जिसे चौरागढ़ महादेव के नाम से जाना जाता है। इस स्थान पर जाने के लिए सीढ़ियों के अलावा ट्रैकिंग के जरिए भी पहुंचते हैं। यहां आने वाले श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूरी होने पर भगवान को त्रिशूल अर्पित करते हैं।
जटाशंकर
पचमढ़ी के बस स्टेंड के पास ही है जटाशंकर महादेव। इस स्थान के बारे में पौराणिक कथा में गया गया है कि यहां शिवजी ने अपने जटाएं खोली थीं। यहां की संरचना शेषनाग से मिलती जुलती है। यह भी कहा जाता है कि भगवान भोलेनाथ यहां भस्मासुर से बचने के लिए छुपे थे। यहां प्राकृतिक शिवलिंग भी बने हुए हैं, जो श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र हैं। यहां आसपास की विशाल चट्टानों पर शिवलिंग की आकृति, गणेशजी की आकृति नजर आती है।
अप्सरा विहार
अप्सरा विहार एक सुंदर और शांत वातावरण में स्थित एक झरना है। यह मुख्य सड़क से 10 मिनट की दूरी पर पर है और जंगल के भीतर ढालान वाले इलाके में है। ब्रिटिश काल में इस स्थान पर महिलाएं स्नान करने आती थीं। तभी से इस स्थान को अप्सरा विहार यानी अप्सरा वाटर फॉल कहा जाने लगा। पचमढ़ी बस स्टैंड से तीन किलोमीटर दूर मार्ग के साथ 1.5 किलोमीटर नीचे की दिशा में चल कर जाइए। इसके अलावा यहां सिल्वर वाटर फाल भी है। यह झरना चांदी की तरह चमकता नजर आता है, इसलिए इसे रजत वाटर फॉल भी कहा जाता है।
बी फॉल
बी फॉल पचमढ़ी का सबसे खूबसूरत स्थान है। यहां जो भी जाता है वो बी फॉल देखने जरूर जाता है। यह स्थान पहाड़ों और जंगल से घिरे प्राकृतिक वातावरण में है। 35 मीटर ऊंचाई से पानी गिरता है। यहां पर्यटक नहाने का भी मजा ले सकते हैं। यहां का पानी काफी ठंडा होता है, जो गर्मियों में काफी सुकून देता है। इस स्थान पर अधिक चट्टानें होने के कारण यहां दुर्घटना का भी खतरा बना रहता है।
डचेस फॉल
डचेस फॉल यहां पर पहुंचने के लिए पर्यटकों को तीन से चार किमी पैदल चलना पड़ता है। वन विभाग के अंतर्गत यह क्षेत्र आता है। यहां का झरना काफी खूबसूरता है। यहां तक आने के लिए पर्यटकों को ट्रैकिंग करनी पड़ती है जो पर्यटकों के लिए रोमांचक होती है।
पांडव गुफाएं
चट्टानों को काटकर बनाए गए पांच मंदिरों का एक समूह, जो प्राकृतिक रूप से उगाए गए बगीचों से घिरा हुआ है, यह पचमढ़ी में सबसे अधिक मांग वाले स्थानों में से एक है। ये आकर्षक गुफाएँ विभिन्न युगों से संबंधित कई कहानियों से घिरी हुई हैं और अंततः बौद्ध भिक्षुओं द्वारा बनाई गई थीं, जिन्होंने इन गुफाओं का उपयोग ध्यान के लिए किया था क्योंकि पर्यावरणीय प्रभाव से उन्हें बहुत मदद मिली थी। माना जाता है कि पांडवों का साहसिक कार्य जहां वे अपने निर्वासन के दौरान इन गुफाओं में रहते थे, सभी कहानियों में सबसे आम है और इसलिए, वे पांडव गुफाओं के रूप में प्रसिद्ध हो गए।
कैसे पड़ा नाम 'पचमढ़ी'
पचमढ़ी दो शब्द पंच अर्थात पांच और मढ़ी अर्थात गुफा से मिलकर बना है। इसके अलावा एक पौराणिक कथा भी है जिसमें इसके नाम का जिक्र किया जाता है। यहां यह उल्लेख मिलते हैं कि पांडवों ने यहां के गुफाओं में वनवास का समय गुजारा था। ये गुफाएं यहां एक छोटे से पहाड़ पर स्थित हैं।
ऐसा था इतिहास
इसका इतिहास काफी पुराना है। वनवास के दौरान पांडवों ने समय बिताया था। बौद्ध भिक्षुओं ने भी यहां ध्यान लगाया था। इसी इलाके में गोंड राजाओं का राज था। कोरकू जनजाति भी यहां पाई जाती है। जबकि दुनिया के सामने पचमढ़ी ब्रिटिश काल में आया। 1887 में यहां एक अग्रेज अधिकारी कैप्टन जेम्स फोर्सिथे ने इसकी खोज की थी। इतिहास के पन्नों में यह दर्ज है कि तात्या टोपे की तलाश में अंग्रेज अधिकारी केप्टन जेम्स फोर्सिथे यहां आए थे। तब वो पचमढ़ी की खूबसूरती देखकर मोहित हो गए। उन्होंने यहां सेना का कैंप ही बनवा दिया। भारत के वन विभाग की स्थापना भी पचमढ़ी में हुई थी। आज भी फारेस्ट विभाग का पहला हेड क्वार्टर यहां मौजूद है, जिसे बायसन लॉज के नाम से जाना जाता है। अब यह पर्यटकों के लिए म्यूजियम बना दिया गया है।
कैसे पहुंचे पचमढ़ी
सड़क मार्ग से पचमढ़ी भोपाल और इंदौर से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। भोपाल के हबीबगंज बस टर्मिनल से बसें चलती हैं जो 5-6 घंटे में पचमढ़ी पहुंचती हैं। पचमढ़ी पहुंचने के लिए नजदीकी रेलवे स्टेशन पिपरिया है जो केवल 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। अगर आप हवाई मार्ग से पहुंचना चाहते. हैं तो भोपाल और नागपुर यहां से नजदीकी एयरपोर्ट हैं।
प्रमुख शहरों से दूरी
भोपाल से पचमढ़ीः 200 किलोमीटर
नागपुर से पचमढ़ीः 261 किलोमीटर
पिपरिया से पचमढ़ीः 50 किलोमीटर
Updated on:
22 Apr 2024 10:12 am
Published on:
01 Feb 2024 12:16 pm
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