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दयाराम की मदद को आगे बढ़े हाथ, अपने देश हुआ रवाना

- नेपाली समाज ने दी आर्थिक सहायता, अस्पताल ने कराई टिकट - समाजसेवियों ने दी आर्थिक सहायता और बैसाखी

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दयाराम की मदद को आगे बढ़े हाथ, अपने देश हुआ रवाना

दयाराम की मदद को आगे बढ़े हाथ, अपने देश हुआ रवाना

भोपाल. आर्थिक अभाव के चलते अपने देश से सैंकड़ों किलोमीटर दूर हमीदिया अस्पताल में भर्ती रहने को मजबूर दयाराम को आखिरकार गांव, घर की दहलीज नसीब हो सकेगी। अस्पताल प्रबंधन, समाजसेवियों और नेपाली समाज के स्वजनों की मदद से नेपाल रवाना हो गया। दयाराम गुरुवार को बिहार के दानापुर स्टेशन तक पहुंच गया है, जहां से जीआरपी ने उसे नेपाल के भीटामोर के लिए रवाना कर दिया है। शुक्रवार सुबह तक दयाराम अपने गांव सीतापुर पहुंच जाएगा। गौरतलब है कि पत्रिका ने 11 सितम्बर को, 'भले बैसाखियों पर जाना पड़े, अपने देश जाना चाहता हूं.़.़Ó शीर्षक से दयाराम की व्यथा को प्रकाशित किया था जिसके बाद नेपाली समाज और समाजसेवी सामने आए।
दयाराम सादा ने पत्रिका को बताया था कि, वह नेपाल के सीतापुर के भागा थाने के बकरी धरमपुरका रहने वाला है, काम ढूंढते हुए जुलाई के आखिर में भारत आया था। बैंगलूरू की ओर जाते समय होशंगाबाद के पास वह पटरियों पर गिरकर चोटिल हो गया। उसे होशंगाबाद से भोपाल रेफर किया गया। इलाके बावजूद पांव पूरी तरह ठीक नहीं हुआ। इसके बाद अगस्त से ही

वह हमीदिया में भर्ती रहने को मजबूर था। उसने बताया कि, परिवार में पत्नी राजवती और पांच साल की बेटी रेखा है, जिनकी उसे बहुत याद आती है लेकिन रुपए नहीं होने और पैरों में ताकत नहीं होने से वह घर नहीं जापा रहा है।

नेपाली समाज के व्यक्तियों ने की मदद

दयाराम का दर्द सामने आने के राजधानी का नेपाली समाज आगे आया। समाज के प्रतिनिधि हमीदिया आए और अस्पताल प्रबंधन को रुपए दिए। इन्हीं रुपयों से दयाराम की टिकट कराई गई। इस बीच समाजसेवी मोहन सोनी ने उन्हें वॉकर और कपड़े उपलब्ध कराए और ट्रेन में बैठाकर आए। इस बीच समाजसेवियों ने बिहार के दानापुर में जीआरपी से सम्पर्क कर दयाराम को उतरने पर नेपाल की बस में बैठाने की व्यवस्था करवा दी। ट्रेन गुरुवार दोपहर दानपुर पहुंच गई जहां से पुलिस जवानों ने दयाराम को नेपाल की बस में बैठा दिया है।