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भोपाल

भिक्षावृत्ति प्रतिबंधित, लेकिन मानसिक दिव्यांगों के विस्थापन की व्यवस्था नहीं

ग्वालियर- इंदौर में ही पुनर्वास, सीहोर में सिर्फ दवाइन्हें हटाने की कार्रवाई पूरी की भी जाती है तो विस्थापन इंदौर या ग्वालियर करना पड़ता है। जो व्यक्ति या अफसर इसका जिम्मा उठाता है उसके सामने कई बार वाहन की ही दिक्कत आ जाती है कि इंदौर-ग्वालियर कैसे भेजा जाए? ऐसे में अधूरी व्यवस्थाओं से पूरा […]

भोपालMar 25, 2025 / 12:18 pm

देवेंद्र शर्मा

Mental Health Tips: Start your day with good vibes, know easy ways

Mental Health Tips: Start your day with good vibes, know easy ways

ग्वालियर- इंदौर में ही पुनर्वास, सीहोर में सिर्फ दवा
इन्हें हटाने की कार्रवाई पूरी की भी जाती है तो विस्थापन इंदौर या ग्वालियर करना पड़ता है। जो व्यक्ति या अफसर इसका जिम्मा उठाता है उसके सामने कई बार वाहन की ही दिक्कत आ जाती है कि इंदौर-ग्वालियर कैसे भेजा जाए? ऐसे में अधूरी व्यवस्थाओं से पूरा व्यवस्थापन नहीं हो पा रहा है जो शहर को भिखारी मुक्त करने की दिशा में बड़ी बाधा साबित हा रही है। सीहोर में करीब डेढ़ साल पहले 105 करोड़ से मानसिक आरोग्य केंद्र शुरू किया गया था। यहां पहुंचने वाले मरीजों को देखा जाता है ओर दवा दी जाती है, लेकिन उन्हें रखने का फिलहाल यहां कोई काम नहीं है। इंदौर की तरह भोपाल में भी मानसिक आरोग्य केंद्र शुरू हो तो यहां सामान्य के साथ मानसिक दिव्यांग भिखारी का भी पुनर्वास पूरी तरह सुनिश्चित हो। शहर को भिखार मुक्त करने की दिशा में ये बड़ा कदम होगा।
  • पुलिस प्रशासन, महिला बाल विकास विभाग से लेकर सामाजिक न्याय विभाग अधूरे इंतजामों से उलझन में, इंदौर, ग्वालियर भेजा जाता है, कई बार वाहन की व्यवस्था तक नहीं होती
    भोपाल.
    जिले में भिक्षावृत्ति प्रतिबंधित है और इस मामले में एफआइआर तक दर्ज हो चुकी है, लेकिन शहर की सडक़- फुटपाथ पर भटकते हुए जीवन यावन कर रहे मानसिक दिव्यांग को लेकर कोई व्यवस्था नहीं हो पाई। स्थिति ये हैं कि भिक्षावृत्ति रोकथाम के लिए काम कर रही महिला बाल विकास, पुलिस प्रशासन, सामाजिक न्याय व नगर निगम की टीम इन्हें सडक़ से हटाने की कोई कार्रवाई ही नहीं कर पा रही है।
ऐसे समझे मानसिक दिव्यांग का विस्थापन
  • मामले में पुलिस या सामाजिक संस्थाएं जिला प्रशासन में आवेदन देकर विस्थापन की मांग करती है। इसपर संबंधित व्यक्ति की जांच होती है, उसकी रिपोर्ट्स तैयार होती है। यदि आंशिक विकलांगता है तो प्रशासन की मंजूरी सामाजिक न्याय विभाग संयुक्त संचालक इंदौर के लिए आदेश करते हैं। यदि पूर्ण विकलांगता है तो फिर सीजेआई के माध्यम से ग्वालियर के आदेश होते हैं। जो संस्था या विभाग कार्रवाई करता है उसे ही संबंधित आरोग्य केंद्र में मरीज को भेजना पड़ता है। पुलिस को इसमें वाहन की व्यवस्था का जिम्मा है, लेकिन कई बार ये नहीं मिल पाती और विस्थापन नहीं हो पाता। इस समय शहर में 40 ऐसे प्रकरण लंबित है।
मानसिक दिव्यांगों के ये कानून में ये प्रावधान
  • 2017 में भारत में द राइट्स ऑफ पर्सन्स विद डिसएबिलिटीज़ एक्ट, 2016 लागू किया गया था। इसमें 21 प्रकार की दिव्यांगताओं को शामिल किया गया। मानसिक बीमारी, बौद्धिक दिव्यांगता, ऑटिज्म, विशेष सीखने की अक्षमता को भी शामिल किया गया। यह अधिनियम मानसिक दिव्यांग व्यक्तियों को सम्मान, समानता और स्वतंत्रता के साथ जीवन जीने का अधिकार देता है और उनके पुनर्वास, शिक्षा, रोजगार और सुरक्षा को सुनिश्चित करता है। मानसिक रूप से असमर्थ व्यक्ति के मामलों के लिए न्यायिक अभिभावक नियुक्त करने का प्रावधान। किसी भी दिव्यांग व्यक्ति को शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य सेवाओं आदि से वंचित नहीं किया जा सकता। भेदभाव पर दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान। यह अधिनियम मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े संस्थानों को रजिस्टर करने और उनके क्षेत्र को नियंत्रित करने के प्रावधान भी शामिल करता है।
भोपाल में ऐसी स्थिति
  • कोहेफिजा थाने के पास जीएडी ब्रिज के नीचे दो महिलाएं मानसिक दिव्यांग है और पूरे समय यहीं घुमती है। कलेक्ट्रेट से एक किमी के दायरे में होने के बावजूद व्यवस्था नहीं। टाइसन मेडिकल के सामने कोहेफिजा थाने के सामने दिव्यांग बुजूर्ग है। ब्रिज से नीचे चार महिलाएं वहीं रहती है। एयरपोर्ट रोड पर तीन से चार महिलाएं मानसिक दिव्यांग है और वहीं रहती है।
कोट्स
तय व्यवस्थाओं के अनुसार ही हम विस्थापन की प्रक्रिया करते हैं। जरूरी होने पर इलाज के लिए मरीज बाहर भेजते हैं।
  • आरके सिंह, संयुक्त संचालक, सामाजिक न्याय

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