21 जनवरी 2026,

बुधवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

छत्तीसगढ़ में बांस का संकट : कभी बांस ने संवारी जिंदगी लेकिन अब 18000 लोगों के लिए परिवार चलाना मुश्किल

यह सुनने में आश्चर्य लगेगा कि जंगल की अधिकता वाले छत्तीसगढ़ राज्य में बांस का संकट है लेकिन यह एक कड़वा सच है और यह सच से कंडरा/बंसोड़ समाज के हजारों परिवार रुबरू हो रहे हैं। इन परिवारों की रोजी रोटी बांस से उपयोगी वस्तुएं बनाने व बिक्री करने से आती है। इनकी स्थिति रोज कमाने-रोज खाने जैसी है और आज कल सरकारी रियायत के बांस न मिलने से इनके सामने जीविकोपार्जन का संकट पैदा हो गया है।

2 min read
Google source verification

भिलाई

image

Shiv Singh

Jun 16, 2022

छत्तीसगढ़ में बांस का संकट : कभी बांस ने संवारी जिंदगी लेकिन अब 18000 लोगों के लिए परिवार चलाना मुश्किल

छत्तीसगढ़ : दुर्ग जिले के कंडरापारा मोहल्ले में बांस की टोकरी बनाते गौरी शंकर व एक अन्य महिला

खास खबर
शिव सिंह
भिलाई. अपनी प्राकृतिक और खनिज संपदा के लिए चर्चित छत्तीसगढ़ में अब बांस की कमी होने लगी है। ऐसे में बांस से उपयोगी वस्तुएं बनाकर बेचने वाले कंडरा/ बंसोड समाज के लगभग 18000 लोगों के लिए अब दो जून की रोटी जुटाना मुश्किल है। मंत्रियों-अफसरों के चक्कर लगाने के बाद कई परिवार कोचिए-ठेकेदारों से ऊंचे दर पर बांस लेने व निॢमत सामग्री सस्ते दर पर बेचने के लिए मजबूर हैं।
यह बात बेहद चौंकाने वाली है कि देश में वन क्षेत्र के मामले में तीसरा स्थान रखने वाले छत्तीसगढ़ में बांस का संकट पैदा हो गया है जबकि वन अमला वन क्षेत्र बढ़ाने के लिए आधा दर्जन प्रमुख योजनाएं संचालित कर रहा है। इनमें एक योजना राष्ट्रीय बांस मिशन भी है। जरूरत के अनुसार बांस पैदा न होने से आज हालत यह है कि बांस से उपयोगी सामग्री निर्मित कर घर-परिवार चलाने वाले परिवार संकट में है। दुर्ग के कंडरा पारा के गौरीशंकर कहते हैं कि सरकारी बांस न मिलने से काम करना मुश्किल हो गया है। पड़ोस में खड़ी रमशीला नेताम ने बताया कि डिपो से बांस नहीं मिल रहे हंै। १०० रुपए का बांस कोचिए से २०० रुपए में खरीदने के लिए मजबूर हैं। समाज के बेहद गरीब वर्ग के इन लोगों का दर्द वाजिब है लेकिन मंत्री से लेकर अफसर तक अनसुना कर रहे हैं।
3250 कार्डधारी हैं, नए बनना बंद
प्रदेश में वर्तमान में ३२५० कार्डधारी पंजीकृत हैं। इन्हें कार्ड देख कर प्रति परिवार १५०० बांस प्रति वर्ष रियायती दर पर दिया जाना चाहिए लेकिन नहीं मिल रहे हैं। पिछले कई साल से नए कार्ड भी नहीं बनाए जा रहे हैं।
कोचिए-ठेकेदारों के चंगुल फंस रहे
सरकार से रियायती दर पर बांस न मिलने से कंडरा/बंसोड़ समाज के लोग कोचिए, टॉल या ठेकेदारों के ऊंचे दर पर बांस खरीदने व निर्मित सामग्री सस्ते दर पर बेचने के लिए मजबूर हैं। एक महिला ने बताया कि बाजार में 100-120 रुपए में बिकने वाला सूपा कोचिए या ठेकेदार सिर्फ 70 रुपए देता है। 50 रुपए की टोकनी 20 रुपए देता है। अन्य सामग्री का भी यही हाल है।
हजारों की जीविका पर संकट
छत्तीसगढ़ कंडरा समाज आदिवासी समाज के प्रदेश अध्यक्ष भोला मरकाम ने बताया कि राज्य में कंडरा/बंसोड समाज के हजारों परिवार बांस से उपयोगी सामग्री बनाकर जीविका चलाते हैं। सरकार प्रति परिवार प्रति वर्ष 1500 नग बांस देने की व्यवस्था की है लेकिन बांस नहीं मिल रहे हैं। ऐसे में परिवारों के सामने भुखमरी जैसी नौबत आ गई है। वैसे भी विलुप्त होती बांस कला को यही समाज जिंदा रखे हुए है लेकिन ऐसे में कब तक कर पाएंगे।
ढेरों योजनाएं फिर बांस का संकट
वन आवरण की दृष्टि से देश में छत्तीसगढ़ राज्य का तीसरा स्थान है। भारतीय राज्य वन रिपोर्ट (आईएसएफआर-२०२१) के मुताबिक छत्तीसगढ़ के वनक्षेत्र में 106 वर्ग किमी की बढ़त भी दर्ज की गई है। अधिकारियों के मुताबिक वन विभाग द्वारा राज्य कैंपा निधि, हरित भारत मिशन (ग्रीन इंडिया मिशन) हरियर छत्तीसगढ़ अभियान, हरियाली प्रसार योजना, राष्ट्रीय बांस मिशन, वन विकास अभिकरण और मनरेगा आदि विभिन्न योजनाओं के तहत प्रदेश भर में वन भूमि और गैर वन भूमि पर लगातार पौधे रोपे जा रहे हैं।
कर रहें व्यवस्था
बांस की उपलब्धता कम होने से यह समस्या आई है। अभी भानुप्रतापपुर से डेढ़ लाख बांस मंगवाए हैं। मानीटरिंग कर रहे हैं और सभी कार्डधारी लोगों को बांस दिए जाएंगे।
बीपी सिंह
सीसीएफ दुर्ग संभाग