
Sanja Lokparva Celebration in Nimar
बड़वानी. आज शहर में भूली पड़ीगी है म्हारी संजा..., घणी याद आवे है गांव की सजीली संजा..., अब बड़ी हुई गी पण घणी याद आवे गीत संजा..., म्हारी पोरी के भी सिखऊंगी बनानी संजा..., मीठा-मीठा बोल उका व सरस गीत गावेगी संजा... जैसे गीतों की गूंज अब शहरों में कम ही सुनाई देती है। एक समय मालवा, निमाड़ के लोकपर्व संजा पर शाम होते ही कन्याएं संजा गीत गाकर पर्व मनाती थी। संजा पर्व की तैयारी कन्याएं 10 पूर्व से ही करने लगती थी। सोलह श्राद्ध में मनाए जाने वाले इस पर्व में कुंवारी कन्याएं गोबर से दीवार पर 15 दिनों तक विभिन्न कलाकृतियां बनाकर उसे फूल-पत्तियों से श्रंगारित करती है।
पहले दिन पांच पांचे, बारहवें दिन किलाकोट
पहले दिन पांच पांचे, दूसरे दिन बीजोरा, तीसरे दिन तिजोरा, चौथे दिन बजोट, पांचवें दिन कुंवारा-कुंवारी, छठे दिन छबड़ी, सातवें दिन सातिया (स्वस्तिक), आठवें दिन आठ पखुड़ी का फूल, नौवें दिन डोकरा-डोकरी, दसवें दिन बंदर की थैली, ग्यारहवें दिन केल (केले का पेड़), बारहवें दिन से पूरा किलाकोट।
पर्व आते ही लड़कियां हो जाती थी प्रसन्न
एक समय था जब संजा का पर्व आते ही लड़कियां प्रसन्न हो जाती थी। संजा को कैसे मनाना है, ये बड़ी लड़कियां छोटी लड़कियों को बताती थी। शहर में सीमेंट की इमारतें और दीवारों पर महंगे पेंट पुते होने, गोबर का अभाव, लड़कियों के ज्यादा संख्या में एक जगह न हो पाने की वजह, टीवी, इंटरनेट का प्रभाव और पढ़ाई पर ज़ोर की वजह से शहरों में संजा मनाने का चलन खत्म सा हो गया है, लेकिन गांवों में पेड़ों की पत्तियां तरह-तरह के फूल, रंगीन कागज, गोबर आदि की सहज उपलब्धता से ये पर्व अब भी मनाया जा रहा है। शहरों में भी कुछ परिवार अब भी इस लोकपर्व को जीवित रखे हुए है। हालांकि शहरों में अब गोबर की जगह संजा का रूप फूल-पत्तियों से कागज में तब्दील होता जा रहा है।
Published on:
12 Sept 2017 01:44 pm
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