
मल्चिंग विधि से सिंचाई,पॉली कवर से गर्मी से बचाव
पादरू. धान की परंपरागत खेती से अलग बाड़मेर जिले के कई किसान खेती के आधुनिक तरीके अपना अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। पादरू के पेमाराम माली व अन्य किसान अपने खेत में मल्चिंग विधि का इस्तेमाल कर तरबूज की खेती कर लाखों की कमाई कर रहे हैं। गर्मियों के इस शीतल फल को यहां के किसानों ने कम पानी में नई मल्चिग विधि से तैयार कर आयाम स्थापित कर रहे हैं। सिवाना के पादरू के रेलों की सराय के तीन किसान शंकर माली, पेमाराम, तिलोकाराम आधुनिक तकनीक मल्चिंग विधि से बूंद बूंद सिंचाई कर ड्रिप जोड़कर तरबूज की खेती कर रहे हैं।
उद्यान विशेषज्ञों की सलाह से दो साल पहले मल्चिंग विधि अपनाई तो चौंकाने वाला मुनाफा मिला। नई विधि से टीआरएस व कावेरी तरबूज सिर्फ तीन माह सें तैयार हो जाते हैं जो बाजार में हाथों-हाथ बिक जाते हैं।
जनवरी में बीज रोपण होता है। लगभग 15 हजार रुपए प्रति बीघे की लागत आती है। एक बीघे में 25 से 30 क्विंटल तरबूज का उत्पादन कर लगभग 60 से 70 हजार प्रति बीघे का मुनाफा मिलता है।क्या है मल्ंिचग विधि- खेत में ऊंची मेड़ बनाकर उसे पूरी तरह से पॉलीथिन कवर से ढक दिया जाता है। इसके बाद निर्धारित दूरी पर पॉलीकवर में छेदकर बीज रोपा जाता है। पॉली कवर खेत की नमी को बचाए रखता है, साथ खरपतवार के न उगने से जमीन के पोषक तत्व सीधे बीज अंकुरण के बाद पौध को मिलते हैं।
30 मार्च तक तैयार होगी फसल : पेमाराम बताते है जनवरी में मल्चिग विधि से तरबूज के टीआरएस किश्म के बीज की बोआई शुरु कीहैं । यह फसल 30 मार्च तक तैयार हो जाएगी। इस विधि से खेती करने में सिचाई बहुत कम करनी पड़ती है। समय से पहले फसल तैयार हो जाने से अच्छा फायदा भी हो जाता है।
यह भी अपनाने लगे नई विधि :मल्चिग विधि से खेती क्षेत्र के ग्राम पादरू निवासी पेमाराम , शंकर माली ,तिलोकराम खेती कर रहे हैं।किसान बताते हैं वर्तमान मे बीज रोपण कर चुके हैं और सिंचाई पुरी तरह से समय समय कर रहे हैं । ईसमें पुरी कर रहे हैं तीन साढे तीन माह मे तैयार हो जाएगें , पिछली बार भी ईन किसानों ने अनार की बागवानी के बीच खाली स्थान पर तरबूज कर लगभग तीन चार लाख कमाई हैं । तैयार होने पर स्थानीय बाजार मे बेचते हैं भाव 30-35 प्रति किलो मिल जाते हैंआजकल मल्चिग विधी से तरबुज की खेती करते हैं वो अच्छा कारगर हैं उससे रेत मेड़ पाली बनाकर पोलीथीन कवर होता हैं जिससे जल्दी जमीन सुखती नहीं हैं
सिंचाई ड्रिप सिस्टम से होती हैं ईस विधी से कई किसान हाथ आजमा रहे हैं पैदावार दो ढाई महिने से आनी शुरु हो जाती हैं - डॉ प्रदीप पगारिया , कृषि वैज्ञानिक, गुडामालानी
Published on:
24 Mar 2021 01:25 am
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