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लोकरंग के संस्थापक दीपक को नम आंखों से दी अंतिम विदाई

छत्तीसगढ़ के लोक गायक व लोककलाकार एवं ग्राम अर्जुंदा निवासी दीपक चंद्राकर (69) का गुरुवार को एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। उनके निधन से प्रदेश सहित देशभर के कला जगत में शोक की लहर दौड़ पड़ी।

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बड़ी संख्या में लोगों ने दी श्रद्धांजलि

लोकरंग के संस्थापक दीपक चंद्राकर को नम आंखों से दी अंतिम विदाई

बालोद/अर्जुंदा . छत्तीसगढ़ के लोक गायक व लोककलाकार एवं ग्राम अर्जुंदा निवासी दीपक चंद्राकर (69) का गुरुवार को एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। उनके निधन से प्रदेश सहित देशभर के कला जगत में शोक की लहर दौड़ पड़ी। दीपक चंद्राकर छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध लोक कला संस्था लोक रंग अर्जुंदा के संस्थापक थे। वेे 30 साल से इस संस्था को चला रहे थे। इन दौरान भारत वर्ष में हर राज्यों को मिलाकर लगभग 5 हजार से अधिक मंचों में प्रस्तुति दी है।

आकाशवाणी में भी गूंजती थी उनकी आवाज
उनकी आवाज दिल्ली, भोपाल, रायपुर दूरदर्शन, आकाशवाणी में भी गूंजता थी। छत्तीसगढ़ में सबसे ज्यादा आयोजन वाली संस्था लोकरंग ही है। संस्था के संस्थापक दीपक चंद्राकर के निधन के बाद परिजनों सहित लोक कलाकारों की आंखें नम हो गई। शुक्रवार को अर्जुंदा स्थित मुक्तिधाम में उनका अंतिम संस्कार किया गया। अंतिम संस्कार में बड़ी संख्या में लोक कलाकार, परिजन, जनप्रतिनिधि सहित ग्रामीण शामिल हुए और उन्हें श्रद्धांजलि दी।

छत्तीसगढ़ के कला संस्कृति को रखा जिंदा
दीपक चंद्राकर 25 साल की उम्र में कला जगत से जुड़ेे। उन्हें बचपन से ही अपनी कला संस्कृति से लगाव था। नाटक के आयोजनों में भाग लेते थे। लगातार सफलता की सीढ़ी पर चढ़कर छत्तीसगढ़ की संस्कृति, परंपरा को देशभर में पहचान दिलाई।

कला संस्कृति का दर्पण बना लोकरंग
लोकरंग अर्जुंदा की स्थापना 2 अक्टूबर 1993 में हुई। लोकरंग को छत्तीसगढ़ का दर्पण भी कहते हैं। इस संस्था को देखने पर छत्तीसगढ़ की कला संस्कृति, देश भक्ति, जस जंवारा सभी की प्रस्तुति होती है।

फिल्म निर्माता व नाट्य कलाकार भी थे दीपक चंद्राकर
दीपक चंद्राकर सच्चे कलाकार के साथ अच्छे फिल्म निर्माता भी थे। उन्होंने गम्मतिहा, गोपी किशन सहित कई छत्तीसगढ़ी फिल्म व शार्ट फिल्म भी बनाई। कई फिल्मो में काम भी किया। उनके अनुभव एवं अनुशासनात्मक कार्य से लोकरंग इस मुकाम पर पहुंचा। वे मदन, झुमुक दास मानिकपुरी एवं नेक दास मानिकपुरी के नाच से प्रभावित थे।

मिला कई सम्मान, बॉलीबुड में एंट्री नहीं कर सके
इनके बेहतर कार्य व छत्तीसगढ़ की संस्कृति को आगे बढ़ाने व देशभर में पहचान दिलाने पर विभिन्न संस्थाओं व लोक कलाकारों ने सम्मान किया। एक बार बॉलीबुड फिल्म में एंट्री लेने मुंबई भी गए। वे सवारी नामक फिल्म की शूटिंग के लिए गए थे, पर सफल नहीं हो पाए। इसके बाद छत्तीसगढ़ में कला जगत को आगे बढ़ाने की शुरुआत की।