ओरछा की महारानी के भक्तिभाव से प्रसन्न होकर ओरछा गए थे अयोध्या के राजा राम
अयोध्या में प्रसिद्ध कनक भवन मंदिर के पुजारी दिनेश कुमार बताते हैं कि किंवदंतियों के अनुसार संवत 1600 में झांसी के ओरछा के तत्कालीन बुंदेला शासक मधुकर शाह का शाशन था उनकी पत्नी महारानी कुंअरी गणेश भगवान् श्री राम की भक्त थी और ओरछा नरेश मधुकर शाह भगवान कृष्ण के भक्त थे ।जब भी श्री कृष्ण के उपासक महाराज वृंदावन चलने की बात करते तब ओरछा की महारानी उन्हें उनसे अयोध्या चलने की जिद करती इस विषय को लेकर महाराजा और महारानी में अक्सर मान मनुहार चलता रहता था एक दिन जब इसी तरह महाराज ने महारानी से वृंदावन चलने की बात कही उस समय भी महारानी ने कहा कि नहीं मुझे तो राम की नगरी अयोध्या जाना है । इस पर महाराज ने व्यंग करते हुए कहा कि अगर तुम्हें भगवान राम से इतना ही अनुराग है तो तुम उन्हें ओरछा ले आओ यह बात महारानी के हृदय में घर कर गई और उन्होंने यह प्रण किया कि अब वह राम लला को ओरछा ले कर आयेंगी या तो अपना प्राण त्याग देंगी । जिसके बाद महारानी अयोध्या पहुंची और कई दिनों तक प्रतिदिन मां सरयू का स्नान कर अपने इष्ट देव भगवान विष्णु की आराधना की । जब कई दिनों तक पूजा अर्चना के बाद भगवान राम के ओरछा ले जाने के प्रयास में कोई सफलता नहीं मिली तब तब महारानी ने दुखी होकर जल समाधि लेने का प्रण किया और अपना शरीर त्यागने के लिए मां सरयू के जल में छलांग लगा दी । इतने में उनकी गोद में बालस्वरूप में भगवान राम प्रकट हो गए जिसके बाद महारानी प्रसन्न हो गई और उन्होंने भगवान राम से ओरछा चलने का आग्रह किया । जिस पर बालस्वरूप भगवान राम ने ओरछा चलने के बदले महारानी से तीन वचन देने को कहें जिसमें पहले वचन में भगवान राम ने कहा की मैं जिस दिन ओरछा जाऊँगा उस दिन से मुझे राजा का सम्मान मिलेगा और वर्तमान राजशाही का अंत हो जाएगा दूसरे वचन में भगवान राम ने कहा कि मुझे यहां स्थापित कर दिया जाएगा मैं हूं वहीं बैठ जाऊंगा और कहीं नहीं जाऊंगा और तीसरा भगवान राम ने कहा कि पुष्य नक्षत्र में ही ओरछा की ओर प्रस्थान करूंगा ।
महारानी से तीन वचन लेकर ओरछा जाने को तैयार हुए थे बाल स्वरूप भगवान श्री राम
इन तीनों वचनों को महारानी ने स्वीकार किया और भगवान को लेकर ओरछा की ओर चल पड़ी क्यूंकि पुख्य नक्षत 24 घंटे में एक बार ही आता है इसलिए महारानी को ओरछा पहुचने में 6 माह लग गए । वहीँ महारानी ने ओरछा के महाराज को संदेश भिजवाया कि वह भगवान राम को लेकर ओरछा आ रही हैं जिसके बाद ओरछा में भगवान राम के लिए भव्य विशाल चतुर्भुजी मंदिर का निर्माण शुरू हुआ , जब तक मंदिर न बने तब तक महारानी ने भगवान राम को अपने रनिवास राजमहल में रहने का आग्रह किया और वहीँ उनकी सेवा पूजा करने लगी ,एक दिन महारानी को यह अहसास हुआ कि वचन के अनुसार भगवान जब से आये हैं तब से खड़े हैं उनके पाँव दुःख रहे हैं तब महारानी ने कहा कि प्रभ आप थक गए होंगे बैठ जाएँ ,जिस पर भगवान ने उन्हें वचन याद दिलाते हुए कहा कि अगर मै जहां बैठ गया वहीँ हमेशा के लिए बैठ जाऊंगा फिर भी महारानी ने उन्हें अपने रनिवास में ही बैठने का आग्रह किया और फिर भगवान श्री राम महारानी के रनिवास राजमहल में ही विराजमान हो गए और दुसरे मंदिर में नहीं गए तब से उनकी पूजा सेवा ओरछा के राजा के रूप में हो रही है और यह परम्परा आज भी कायम है । वहीँ ओरछा नरेश की पुत्रवधू ने भक्ति भाव से प्रेरित होकर अयोध्या के कनक भवन का जीर्णोधार भी कराया जहां प्रतिवर्ष दीपावली के मौके पर भव्य आयोजन होते हैं ।