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छह महीने इस अनजान जगह पर बिताती हैं विदेशी महिलाएं

तिलोनिया...अजमेर जिले का एक छोटा सा गांव है लेकिन यह कई देशों में अपनी अलग पहचान रखता है। यहां विदेशी महिलाएं मात्र 6 महीने के लिए आती हैं। लेकिन लौटने के बाद गांवों के लिए उजियारे की सौगात लेकर जाती हैं।

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छह महीने इस अनजान जगह पर बिताती हैं विदेशी महिलाएं

छह महीने इस अनजान जगह पर बिताती हैं विदेशी महिलाएं

युगलेश शर्मा.
अजमेर. अजमेर जिले के तिलोनिया गांव के बेयरफुट कॉलेज से भारत सहित 96 देशों की करीब 3 हजार अनपढ़, गरीब और उम्रदराज महिलाएं सोलर इंजीनियर बन कर निकली हैं।

महिलाओं को यहां सोलर एलईडी लाइट, सोलर लालटेन और चार्ज कंट्रोलर तैयार करना सिखाया जा रहा है। यह महिलाएं अब तक न केवल अपने देशों में लौटकर 75 हजार घरों को रोशन कर चुकी हैं बल्कि वहां की जरूरतमंद महिलाओं को प्रशिक्षित कर सोलर इंजीनियरिंग की दुनिया भर में ब्रांड एंबेसेडर बन रही हैं। ऐसे में यह गांव न केवल महिला सशक्तिकरण बल्कि सौर ऊर्जा के जरिए दुनिया भर में रोशनी फैलाने का काम भी कर रहा है।

कई ऐसे गांव जहां बिजली नहीं

बेयरफुट कॉलेज का यह प्रकल्प अब महज एक कोर्स नहीं रहकर देश-दुनिया में दूरदराज स्थित गांवों से अंधकार को मिटाने की मुहिम बन चला है। यहां की खासियत भी यह कि सोलर इंजीनियरिंग के प्रशिक्षण और सोलर उपकरण तैयार करने के लिए भी अभावों से जूझते और अंधेरों से लड़ते जरूरतमंद गांवों की जीवट और जुनून वाली महिलाओं का ही चयन किया जाता है। इसके लिए आईटीईसी (इंडियन टेक्निकल एंड इकोनॉमिक कॉपरेशन प्रोग्राम) के जरिए फॉर्म भरवाए जाते हैं। इसके बाद बेयरफुट कॉलेज की टीम उन गांवों में जाकर ग्राउंड पार्टनर के साथ सर्वे कर महिलाओं का चयन करती है जहां अभी तक बिजली नहीं पहुंची है।

फिटिंग और रिपेयरिंग का भी प्रशिक्षण

यहीं पर सोलर उपकरण तैयार करने का प्रशिक्षण लेने वाली महिला मगन कंवर आज मास्टर ट्रेनर हैं। मगन कंवर ने बताया कि वर्तमान में वह सोलर लालटेन, एलईडी लाइट और चार्ज कंट्रोलर का प्रशिक्षण महिलाओं को दे रही हैं। ट्रेनिंग के बाद गांव में जाकर कैसे लाइट फिटिंग करनी है और खराब होने पर कैसे रिपेयर करनी है, इसका व्यावहारिक प्रशिक्षण भी दिया जाता है।

बेझिझक आती हैं महिलाएं


प्रशिक्षण के लिए महिलाओं को एक अनजान जगह पर छह महीने के लिए आना होता है। ऐसे में महिलाओं व उनके परिजन के मन में कुछ स्वाभाविक शंकाएं भी रहती हैं। लेकिन बेयरफुट कॉलेज का नाम ही उनकी किसी भी तरह की शंंकाओं का समाधान कर देता है और शंकाओं के साथ यहां आने वाली प्रशिक्षु महिलाएं छह माह के प्रशिक्षण के बाद अपने गांवों के लिए उजियारे की सौगात लेकर जाती हैं।

ऐसे हुई थी शुरुआत

बेयरफुट कॉलेज में पिछले 35 साल से कार्यरत लक्ष्मण सिंह ने बताया कि वर्ष 1990 में यहां 13 किलोवाट का सोलर प्लांट लगा। इसके बाद लद्दाख, उत्तराखंड और सिक्किम में सोलर उपकरण तैयार करने का प्रशिक्षण दिया गया। वर्ष 2004 में विदेशी महिलाओं का यहां आना शुरू हुआ।

पहले आते रहे हैं पुरुष भी

वर्ष 2000 से पहले यहां पुरुष व महिलाओं दोनों को प्रशिक्षण दिया जाता था। लेकिन प्रशिक्षण के बाद पुरुषों का शहरों में जाकर रोजगार शुरू करने और महिलाओं का गांवों में ही बंधकर रह जाने का चलन बढऩे लगा। ऐसे में प्रशिक्षण को केवल महिलाओं के लिए ही नियत कर दिया गया। शुरुआत में अफगानिस्तान, भूटान और इथोपिया की महिलाओं को प्रशिक्षण दिया गया। इसके बाद अन्य देशों की महिलाएं तिलोनिया आने लगीं। 2008 में सरकार के सहयोग से राष्ट्रीय स्तर पर और 2009 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ट्रेनिंग शुरू हुई।

इन देशों की महिलाएं शामिल

कमलेश बिस्ट के अनुसार बेयरफुट कॉलेज में वर्ष 2004 से अब तक 96 देशों की महिलाएं प्रशिक्षण ले चुकी हैं। इनमें दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका, एशिया और पेसिफिक आईलैंड के कई देश शामिल हैं। हालांकि पिछले दो साल से कोरोना के चलते विदेशी महिलाएं यहां नहीं आ पा रही हैं।

अलग देश-सा नजारा

तिलोनिया की जनसंख्या मात्र 3 हजार है, लेकिन बेयरफुट कॉलेज के कारण इसका नाम दुनिया के 96 देशों तक पहुंच चुका है। विभिन्न देशों से यहां प्रशिक्षण के लिए आने वाली महिलाओं के कारण यह गांव किसी अलग देश-सा नजर आता है।