
डॉ. नरेन्द्र रावल।
अहमदाबाद. अहमदाबाद के सीनियर चेस्ट फिजिशियन डॉ. नरेन्द्र रावल ने कहा कि कोरोना के वायरस शरीर में प्रवेश करने के बाद 5-7 दिन में फेफड़ों में छोटे-छोटे न्यूमोनिया पैदा करते हैं। 5-7 दिन से 14 दिन तक फेफड़ों में रहते हैं। को-मोर्बिड कंडीशन वाले और बुजुर्ग लोगों में 2 से 5 प्रतिशत तक लंबे समय तक भी रह सकते हैं। आरटी-पीसीआर टेस्ट की रिपोर्ट 100 में से 70 प्रतिशत सही आने की संभावनना है। उसका मतलब आरटी-पीसीआर टेस्ट की रिपोर्ट 30 प्रतिशत लोगों में कोरोना होने पर भी नेगेटिव आने की संभावना है। ऐसे मामले में कोरोना के मरीज का 5-7 दिन में चिकित्सकों की ओर से सीटी स्केन करवाया जाता है।
सीटी स्केन का रेज यानी रेडिएशन एक्स-रे से 100 गुना अधिक होता है लेकिन, रोग कितने प्रतिशत है इसका पता सीटी स्केन में चलता है। रोग की कौनसी दवा देनी, कब तक देनी यह सीटी स्केन से पता चलता है। मोडरेट और सीवियर मामलों में सीटी स्केन करवाना जरूरी है। एक सीटी स्केन करीब 200 एक्स-रे के समान रेडिएशन करता है लेकिन, जिंदगी का सवाल है। रेडिएशन से इंसान मर नहीं जाता। रेडिएशन की जटिलता के कारण शरीर में इसकी अन्य जटिलताएं होना संभव है। सीटी स्केन नहीं करने पर कोरोना कितना प्रतिशत है, कौनसी दवा देनी है, कब तक देनी है उसका पता नहीं चलता।
कोरोना का वायरस फेफड़ों में कितना प्रतिशत न्यूमोनिया करता है, उसका पता सीटी स्केन से चलता है। वह न्यूमोनिया, कोरोना ही करता है। कोरोना का वायरस फेफड़ों में कितना प्रतिशत कोरोना का न्यूमोनिया करता है, उसका पता सीटी स्केन से चलता है। उसके बाद मरीज को कितनी दवा कितनी देनी है, उसका पता चलता है। कोरोना के पहले दिन जो लक्षण लगे यानी खांसी, गले में दर्द, बुखार आदि के पांचवें दिन सीटी स्केन कराना चाहिए। 5-7 दिन में दुबारा भी सीटी स्केन कराना चाहिए। 90 प्रतिशत मरीजों को दुबारा सीटी स्केन कराने की जरूरत नहीं पड़ती। 10 प्रतिशत मरीजों को 20 दिन के आस-पास दुबारा सीटी स्केन कराना पड़ता है। 2-3 प्रतिशत मरीजों को 2 महीने-6 महीने में दो बार और भी सीटी स्केन कराना पड़ता है। गंभीरता के आधार पर सीटी स्केन कराना पड़ता है। डॉ. नरेन्द्र रावल ने कहा कि 2 प्रतिशत लोगों को कोरोना वायरस फेफड़ों में फाइब्रोसिस करता है, ऐसे लोगों को 3-4 बार भी सीटी स्केन कराना पड़ता है।
Published on:
05 Dec 2020 11:24 pm
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