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अब जबकि भाजपा सरकार द्वारा उत्तर प्रदेश को तीन भागों में बांटे जाने की चर्चा है, उसमें आगरा को नजरअंदाज किया जा रहा है, तब यह सवाल उठता है कि लखनऊ राजधानी से करीब चार सौ किलोमीटर दूर आगरा और इसके आसपास के एरिया की इतनी उपेक्षा क्यों की जा रही है? जबकि आगरा कभी सदियों तक देश की राजधानी रहा है। दुनिया में भारत की पहचान आगरा और इसमें बने स्मारकों से भी है। आगरा की उपेक्षा अंग्रेजो ने भी नहीं की । वे इसके महत्व को बखूबी जानते थे। इसलिए उन्नीसवी शताब्दी में जब उन्होंने अपने अधिकार वाले क्षेत्र को आठ भागों में बांटा । उसमें एक प्रांत आगरा के नाम से भी था । इसका एरिया मौजूदा दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश तक था। तब तकरीबन आधा देश आगरा से नियंत्रित होता था।
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ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार सन 1526 से लेकर 1658 तक आगरा मुगल साम्राज्य की राजनाधी रहा। उनके द्वारा बनवाए गए स्मारक ताजमहल, आगरा किला, फतेहपुरसीकरी विश्वदाय स्मारकों की सूची यानि दुनिया के नक्शे पर हैं। पहले आगरा इस्लामी शिक्षा का केंद्र था। बाद में अंग्रेजों ने इसे पश्चिमी शिक्षा का केंद्र बना दिया। अंग्रेजों के जमाने में यहां कलकत्ता और लाहौर, दिल्ली तक से लोग पढ़ने और इलाज कराने के लिए आते थे।
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अंग्रेजों ने भारत पर शासन की नींव 1757 में बंगाल में प्लासी के युद्ध में विजय के बाद डाली। प्लासी के बाद बिहार में बक्सर के युद्ध में सन 1767 में जीत हासिल की, फिर तो उनका कारवां चलता ही रहा। मौजूदा उत्तर प्रदेश में सबसे पहले उन्होंने वाराणसी को जीता फिर गोरखपुर, रुहेलखंड, मैनपुरी, कुमांयू और फिर आगरा। इसे मिलाकर उन्होंने बंगाल प्रेसीडेंसी का नाम दिया। इसका क्षेत्रपल 9979 वर्ग किलोमीटर था। कलकत्ता में बैठकर आगरा तक शासन करना आसान नहीं था। इसलिए उन्होंने आगरा प्रदेश (आगरा प्रोविंस) के नाम से नया प्रदेश बनाया। गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट 1833 के अंतर्गत बनाए गए इस नए प्रदेश के पहले गवर्नर सीटी मेटकाफ थे। लेकिन वह ज्यादा दिन तक इसे संभाल नहीं सके। वह 14 नवंबर, 1834 से 20 मार्च, 1835 तक ही यहां रहे। इसके बाद डब्ल्यू ब्लंट दूसरे गवर्नर बनाए गए जो 20 मार्च 1835 से लेकर एक दिसंबर 1835 तक ही रहे। तीसरे गवर्नर ए. रौस थे, जिन्होंने एक जून 1836 तक जिम्मेदारी संभाली। इस प्रदेश का क्षेत्रफल 9479 वर्ग किलोमीटर और आबादी करीब 45 लाख थी।
इसके बाद नए एक्ट के अंतर्गत राज्यों का पुनर्गठन कर दिया। पहले नार्थ वेस्ट प्रोविंस बनाया। इसकी राजधानी आगरा ही थी। लेकिन 1857 के गदर के बाद दिल्ली डिवीजन को अलग कर दिया और राजधानी को आगरा से इलाहाबाद स्थानांतरित कर दिया। इसके बाद फिर पुनर्गठन कर 1902 में नए प्रांत का नाम संयुक्त प्रांत आगरा एवं अवध रखा गया। इसके अंतगर्त नौ मंडल और 48 जिले थे। इनमें आगरा मंडल से आगरा, मथुरा, फर्रुखाबाद, मैनपुरी, इटावा और एटा शामिल थे। अन्य मंडलों में मेरठ मंडल के मेरठ, देहरादून, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, बुलंदशहर, अलीगढ़, रुहेलखंड मंडल से बिजनौर, मुरादाबाद, बदायूं, शाहजहांपुर, पीलीभीत, ,इलाहाबाद मंडल से कानपुर, फतेहपुर, बांदा, इलाहाबाद, हमीरपुर, झांसी, जालौन, वारा्णसी मंडल में वाराणसी, मिर्जापुर, गाजीपुर, जौनपुर, बलिया, गोरखपुर मंडल में आजमगढ़, गोरखपुर, बस्ती, कुमाऊं मंडल में अल्मोड़ा, नैनी, गढ़वाल, लखनऊ मंडल में लखनऊ, उन्नाव, रायबरेली, हरदोई, सीतीपुर, खीरी, फैजाबाद मंडल में फैजाबाद , बहराइच, गोंडा, सुल्तानपुर, बाराबंकी, प्रतापगढ़ शामिल थे। इसकी राजधानी इलाहाबाद थी। इस नए प्रांत के पहले गवर्नर सीटी मेटकाफ ही थे जो बाद में देश के कार्यवाहक गवर्नर जनरल बने। इसके बाद 1935 में यूनाइटेड प्रोविंस (यूपी) का गठन किया गया। बाद में देश आजाद होने पर भारतीय संविधान के अंतर्गत 26 जनवरी 1950 को इसका नाम बदलकर उत्तर प्रदेश कर दिया गया। सन 2000 में राज्य पुनर्गठन के अंतर्गत उत्तर प्रदेश में से उत्तराखंड को अलग कर दिया गया ।
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मौजूदा उत्तर प्रदेश अब काफी बड़ा है, इसकी आबदी दुनिया के तीन सौ देशों से भी ज्यादा है। प्रशासनिक रूप से इसे संभालना और इसके नागरिकों को सुविधाएं देना किसी एक मुख्यमंत्री के वश की बात नहीं है। इसलिए आजाद भारत में 1956 में जब पहला राज्य पुनर्गठन आयोग बना तो उसके एक सदस्य केएम पाणिक्कर ने उत्तर प्रदेश के विशाल आकार को लेकर चिंता जताई और उन्होंने नए राज्य आगरा का प्रस्ताव दिया। जिसमें मेरठ, आगरा, रुहेलखंड, झांसी मंडल को शामिल करने को कहा। इसलिए भी इसका विभाजन अपरिहार्य है।
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तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने इसके चार टुके किए जाने का प्रस्ताव विधान सभा में पारित कर केंद्र सरकार को भेजा था। इसमें पूर्वांचल बुंदेलखंड, अवध और पश्चिम प्रदेश बनाए जाने शामिल थे। उसे नहीं माना गया। अब भाजपा सरकार द्वारा इसके तीन टुकड़े किए जाने की चर्चा है। इसके अंतर्गत मेरठ से लेकर बुलंदशहर तक के हिस्से को दिल्ली राज्य में मिलाये जाने, सहारनपुर मंडल के तीन जिले हरियाणा में, मुरादाबाद मंडल के सभी जिले उत्तराखंड में शामिल किया जाना शामिल है। बुंदेलखंड के नाम से नया प्रदेश बनेगा जिसमें प्रयागराज, चित्रकूट, झांसी, मिर्जापुर, कानपुर मंडल के 17 जिले शामिल होंगे। पूर्वांचल के नाम से भी एक नया राज्य बनेगा जिसमें गोरखपुर, आजमगढ़, बस्ती, देवीपांटन, अयोध्या, वाराणसी मंडल के सभी जिले शामिल होंगे।
आगरा उत्तर प्रदेश में ही रह जाएगा। इसमें लखनऊ मंडल के अलावा, आगरा, अलीगढ़, बरेली, मंडलों के अलावा कानपुर मंडल के फर्रुखाबाद और कन्नौज जिले रहेंगे। यदि यह चर्चा सही है तो इसमें सबसे ज्यादा अन्याय आगरा और अलीगढ़ मंडल के साथ होगा । नई व्यवस्था के अंतर्गत छोटे-छोटे राज्य बनाए जाने पर भी इन मंडलों के नागरिकों को अपनी समस्याओं के समाधान के लिए चार सौ किलीमीटर की दूरी तय करनी होगी, जो कि व्यावहारिक नहीं है। राज्य के अधिकारियों और कर्मचारियों को बेवजह इतनी लंबी भागदौड़ करनी होगी । मौजूदा समय में आगरा और इसके आसपास का क्षेत्र विकास की दौड़ में पिछड़ रहा है। ताज ट्रिपेजियम जोन इसी क्षेत्र में है, इसकी अलग तरह की समस्याएं है। पुराने सैकड़ों उद्योग बंद करा दिए गए हैं, नए उद्योग लगाने पर प्रतिबंध है। पर्यटन उद्योग भी पिछड़ रहा है। रोजगार के अभाव में अपराध बढ़ रहे हैं । कोई सरकार आगरा में बैठकर ही इसका समधान कर सकती है जो दिल्ली और लखनऊ से कदापि संभव नहीं है ।
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मौजूदा समय में जबकि जनसंख्या का आकार बढता जा रहा है, नागरिकों की सरकारों से अपेक्षाएं बढ़ रही हैं, ऐसे में छोटे- छोटे राज्य बनाए जाने चाहिए। आगरा और अलीगढ़ मंडल मिलकर एक नया राज्य बनने के लिए काफी है। इसकी आबादी मौजूदा हरियाणा और पंजाब के बराबर है। करीब ढाई करोड़। भाजपा को इस क्षेत्र के नागरिकों के लिए भी नरम रुख रखना चाहिए।
दिनेश कुमार वर्मा ‘सारथी’
सदस्य, ताज प्रदेश निर्माण समिति, आगरा
Published on:
07 Nov 2019 09:49 am
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