बीते दौर के कुछ रचनाकारों से जुड़ा एक त्रासद पहलू यह है कि उनकी रचनाएं तो आज भी लोकप्रिय हैं, लेकिन उनका नाम जमाने के लिए भूली हुई दास्तान हो गया है। तनवीर नकवी ( Tanvir Naqvi ) ऐसा ही नाम है, जिन्हें कभी हिन्दी सिनेमा के लोकप्रिय गीतकारों में गिना जाता था। प्रगतिशील शायरी की नुमाइंदा हस्तियों में से एक तनवीर नकवी का सिनेमा में ऐसा रुतबा था कि उस दौर के सितारे उन्हें सलाम करते थे और सितारा बनने की ख्वाहिश रखने वाले उनकी नजर में आने को बेताब रहते थे। वह तनवीर नकवी ही थे, जिन्होंने लाहौर (तब देश का विभाजन नहीं हुआ था) के एक नौजवान की आवाज में छिपे जादू को पहचाना और उसे हिन्दी सिनेमा से जुडऩे के लिए प्रेरित किया। वह नौजवान थे मोहम्मद रफी ( Mohammad Rafi ) । उनका पहला सबसे लोकप्रिय गीत ‘तेरा खिलौना टूटा’ तनवीर नकवी ने ही लिखा था। महबूब खान की ‘अनमोल घड़ी’ (1946) के इस गीत ने ही नहीं, तनवीर नकवी के लिखे हुए 10 और गीतों ने जो धूम मचाई थी, उसकी गूंज आज तक कायम है। टीवी चैनल्स के संगीत मुकाबलों में कभी ‘आवाज दे कहां हैं’, कभी ‘जवां है मोहब्बत हसीं है जमाना’ तो कभी ‘मेरे बचपन के साथी मुझे भूल न जाना’ सुनाई दे जाते हैं।
गानों के दम पर डायमंड जुबली
मोहम्मद रफी के अलावा नूरजहां, सुरैया, शमशाद बेगम, जोहराबाई और सुरेंद्र की आवाजों से लैस ‘अनमोल घड़ी’ में संगीतकार नौशाद के साथ तनवीर नकवी ने ‘आ जा मेरी बर्बाद मोहब्बत के सहारे’, ‘क्या मिल गया भगवान तुम्हें दिल को दुखाके’ और ‘उडऩखटोले पे उड़ जाऊं’ के जरिए भी ऐसा जादू जगाया कि सुरों के उडऩखटोले में सवार होकर इस फिल्म ने डायमंड जुबली मनाई। बरसों बाद ‘अनमोल घड़ी’ की कहानी पर करीना कपूर और तुषार कपूर को लेकर ‘जीना सिर्फ मेरे लिए’ (2002) बनाई गई, लेकिन मूल फिल्म जैसी कामयाबी इसके हिस्से में नहीं आई।
लिखने वाले थे ‘मुगले-आजम’ के गीत
के. आसिफ ‘मुगले-आजम’ के गीत तनवीर नकवी से लिखवाना चाहते थे। उन्होंने इस फिल्म के लिए एक गीत ‘कहां तक सुनोगे, कहां तक सुनाऊं/ हजारों ही शिकवे हैं, क्या-क्या बताऊं’ लिखा भी, लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ कि वे फिल्म से अलग हो गए। यह गीत बाद में नूरजहां ने पाकिस्तानी फिल्म ‘अनारकली’ (1957) के लिए गाया। इसे उनके सदाबहार गीतों में गिना जाता है। तनवीर नकवी आम आदमी के दुख-दर्द, खुशी और उमंग को सादगी से रचते थे, इसलिए हर किसी को यह अपने दिल की आवाज लगते हैं। ‘मल्लिका’, ‘यासमीन’, ‘कारवां’, ‘बड़े घर की बहू’, ‘नई दुनिया’, ‘मि. एक्स’, ‘कैप्टन किशोर’, ‘रुखसाना’ आदि कई फिल्मों के दर्जनों गीत उनकी व्यापक रेंज की सनद हैं।
गुजरा हुआ जमाना आता नहीं दोबारा..
दिलीप कुमार की ‘जुगनू’ में ‘यहां बदला वफा का बेवफाई के सिवा क्या है’ लिखकर विभाजन के बाद तनवीर नकवी पाकिस्तान चले गए, लेकिन हिन्दी सिनेमा ने उनके साथ बेवफाई नहीं की। उन्हें कई फिल्मों के गीत लिखने बुलाया गया। उन्होंने दोनों देशों की करीब 200 फिल्मों में गीत लिखे। उन्हीं के साथ पाकिस्तान गईं नूरजहां को वहां मल्लिका-ए-तरन्नुम के तौर पर स्थापित करने में भी उनका अहम योगदान रहा। ‘शीरीं फरहाद’ के लिए सदाबहार ‘गुजरा हुआ जमाना आता नहीं दोबारा’ लिखने वाले तनवीर नकवी की 54 साल की जिंदगी का सफर लाहौर में एक नवम्बर, 1972 को थम गया। ‘शीरीं फरहाद’ के संगीतकार एस. मोहिन्दर का भी पिछली 6 सितम्बर को मुम्बई में देहांत हो चुका है।