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तारबंदी पर रहे पैनी नजर
जम्मू में गत दिनों सीमा पार कर आए आतंककारियों को स्पष्ट निर्देश थे कि उन्हें जनसाधारण को निशाना बनाना है, ताकि पहले से ही खराब कानून व्यवस्था की स्थिति पर कुछ और भ्रम पैदा हों। इस घटना का पूरा ब्यौरा अब खूब छप चुका है, लेकिन उस पर चर्चा के पूर्व हमें सीमा और नियंत्रण रेखा के आसपास सुरक्षा खामियों पर घ्यान देना चाहिए। चौबीसों घंटों निगरानी में रहने वाली सीमा रेखा को जिस पर कंटीली तारबंदी है, कैसे हथियारों से लैस आतंककारी पार कर सकते हैंक् यह बिल्कुल स्पष्ट है कि घुसपैठ के रास्ते हमारे दावों के विपरीत पूर्णत: बंद नहीं हैं। इससे पहले कि आतंककारियों को चुनौती दी जाती उन्होंने भारतीय सेना के एक जूनियर कमीशन्ड ऑफिसर (जेसीओ) और तीन अन्य नागरिकों को मारने के बाद खुद एक मकान में घुसकर मोर्चाबंदी कर ली।
इससे यह जाहिर होता है कि हमारी पुलिस और गुप्तचर एजेंसियां हथियारबंद आतंककारियों को भयग्रस्त करने के लिए प्रशिक्षित और तैयार नहीं है, जबकि वे हमारी सड़कों पर घूम-फिर रहे हैं। यहां यह कहना भी जरूरी है कि क्षेत्र में जारी हिंसक प्रदर्शनों के चलते पुलिस के दैनिक कार्य भी गड़बड़ा गए और उसका घ्यान भी सुरक्षा संबंधी गंभीर खामियों से हट गया। इसमें कोई दोराय नहीं कि जम्मू में मची खलबली ने आतंककारियों की मदद की। ऎसी हालत में राज्य में हिंसक राजनीतिक खेल की इजाजत नहीं दी जा सकती, क्योंकि इससे केवल पाकिस्तान को ही मदद मिलेगी।
यह अभियान खत्म हुआ, पर हमें इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी। इस दौरान मारे गए लोगों, बंधकों और बच्चों के कष्ट की कल्पना कीजिए जिन्होंने वे सब झेला। विशेष बल ने तीसरे आतंककारी को भी गुरूवार तड़के मार गिराया। अंतिम हमला हमारी सेना ने किया और मकान में बंधक बनाए गए चार बच्चों समेत पूरे परिवार को सुरक्षित बचा लिया गया। इसकी कीमत हमें क्या देनी पड़ी- लोगों को भय एवं आतंक के माहौल को झेलना पड़ा और अफवाहें उड़ती रहीं कि तीन और आतंककारी अभी शहर में ही कहीं आजाद घूम रहे हैं।
तीन आतंककारियों में से एक होने का दावा करने वाले किसी शख्स ने जम्मू में बीबीसी संवाददाता से फोन पर बात की थी। उसने खुद का नाम तलगीरा बताया और कहा था कि वे लोग "कश्मीर में मुसलमानों पर होने वाले अत्याचारों" का विरोध कर रहे हैं। एक अन्य शख्स या फिर इसी ने एक टीवी चैनल के प्रतिनिधि से भी बातचीत की थी, जिसमें उसने कहा कि वे "सेना द्वारा कश्मीर में मुसलमानों के खिलाफ की जा रही क्रूरता" का बदला ले रहे हैं।
जम्मू शहर और आस-पास के क्षेत्र में पिछले एक महीने से हिंसक प्रदर्शन चल रहे थे। इस घटना से मुख्य खतरे की ओर से लोगों का घ्यान भंग हुआ और आतंककारियों को हमला करने का अवसर भी मिला। ये प्रदर्शन भी जमीन के छोटे से टुकड़े आवंटन से जुड़े मामूली विवाद को लेकर शुरू हुए थे, जो श्री अमरनाथ तीर्थ बोर्ड को देकर वापस ली गई थी।
पूरे दो दिन चले इस अभियान में तीन आतंककारी और दो नागरिक मारे गए जबकि एक सैनिक की शहादत भी हुई। इससे एक भयानक बात और उभर कर आई कि आतंककारी दो माह से अशांत क्षेत्र का फायदा उठा सकते हैं।
कश्मीर घाटी में मुस्लिमों को अलगाववादी, कट्टरपंथी यह समझा रहे थे कि श्राइन बोर्ड को जमीन आवंटन करने के पीछे असली उद्देश्य क्षेत्र में जन सांख्यिकीय संतुलन को बदलना है, लिहाजा वे हिंसक प्रदर्शन करें। इधर राज्य सरकार ने स्पष्ट किया है कि तीर्थ बोर्ड को केवल अमरनाथ यात्रा के दौरान जमीन की जरूरत है, जिस पर यात्रियों की सुविधा के लिए अस्थाई शरण स्थल और शौचालय बनाने हैं। जब राज्य सरकार ने जमीन आवंटन के फैसले को निरस्त किया तो जम्मू में उग्रपंथियों ने हिंसक विरोध प्रदर्शन किए। स्थिति तब और ज्यादा बिगड़ गई जब मुस्लिम- बहुल कश्मीर घाटी में लोगों ने आजादी की मांग करते हुए हिंसक प्रदर्शन शुरू किए। प्रशासन ने श्रीनगर और आस-पास के क्षेत्र में कफ्र्यू लगाया, जहां हिंसक विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व करने वाले अलगाववादियों की खासी पकड़ मानी जाती है।
श्रीनगर और आस-पास के क्षेत्र में कफ्र्यू के बावजूद कुछ लोग भारत विरोधी प्रदर्शन कर रहे थे। श्रीनगर के बाहर और इससे 45 मील दूर स्थित हंडवाड़ा में सुरक्षाकर्मियों की गोलियों से दो प्रदर्शनकारी मारे गए। प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षाकर्मियों पर पथराव कर चार पुलिसकर्मियों को घायल भी कर दिया था। पिछले दिनों अशांति के दौरान कश्मीर में लगभग 42 लोग मारे गए। उनमें से कई तो तब मारे गए जब हिंसक भीड़ अनियंत्रित हो गई और सुरक्षाकर्मियों को गोलियां चलानी पड़ीं। कश्मीर में पिछले एक दशक में कभी भी ऎसे हिंसक प्रदर्शन नहीं हुए। ये प्रदर्शन भारत विरोधी आंदोलन की शक्ल अख्तियार कर रहे हैं जो खतरनाक संकेत हैं। इससे कश्मीर में भारत विरोधी आन्दोलन का एक नया दौर शुरू होने के आसार हैं। ज्यादा नुकसान पहुंचाने के लिए आतंककारी भी इससे जुड़ सकते हैं।
पाकिस्तान स्थित आतंककारी पर्वतमाला के दोनों ओर व्याप्त अशांति का फायदा उठा कर कड़ी सुरक्षा वाली सीमा को चुपचाप पार कर लेंगे। सीमाओं की निगरानी करने वाले सुरक्षाकर्मी इन दिनों खासे चौकस हैं, लेकिन वे जम्मू से पश्चिम में 20 मील दूर स्थित दस फुट ऊंचे कंटीलें तारों को काटकर भीतर घुसे आतंककारियों पर नजर रखने में तो चूक ही गए। वे भीतर घुसकर जम्मू पहुंचे और एक दोमंजिला मकान में सात लोगों को उन्होंने बंधक बना लिया जिनमें चार बच्चे भी शामिल थे। उन्होंने यह कैसे किया इसकी जांच अवश्य होनी चाहिए।
पुलिस प्रमुख के. राजिन्द्र कुमार के अनुसार आतंककारी जम्मू में पाकिस्तान की ओर से कंटीले तारों को काटकर घुसे थे। यह बहुत चौंकाने वाली बात है क्योंकि वह मैदानी क्षेत्र है। वहां ऎसा करना खासा मुश्किल है। पाकिस्तान उन आतंककारियों को हथियार और पैसा उपलब्ध करवाता है, जो राज्य में विद्रोह फैलाना चाहते हैं। अधिकृत आंकड़ों के अनुसार अब तक क्षेत्र में फैली अशांति और विद्रोह के दौरान 43 हजार से ज्यादा लोग अपनी जान गंवा बैठे हैं। वर्ष 2004 में भारत व पाकिस्तान द्वारा शांति प्रक्रिया शुरू करने से क्षेत्र में हिंसा घटी है। अब हिंसा फिर से लौट रही है, जिससे शांति प्रक्रिया निष्क्रिय हो सकती है।
अफसर करीम
[लेखक भारतीय सुरक्षा सलाहकार परिषद के सदस्य
रहे हैं]
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