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कविता को नया मुहावरा
ए क सजग कला समीक्षक जब एक संवेदनशील कवि भी होता है तो उसकी कविताएं सहज ही प्रभावशाली शब्दचित्रों का रेखांकन करती हैं। कला समीक्षक डॉ. राजेश कुमार व्यास का कविता संग्रह "कविता देवै दीठ" यानी "कविता दृष्टि देती है" में ऎसे अनेक प्रभावोत्पादक शब्दचित्र हैं। संकलन की छोटी- बड़ी 75 कविताओं के सृजन का प्रस्थान बिन्दु कवि का यह चिंतन है कि "आ भरोसो राखता रचां/आपां कविता/सेवट/ कविता है/अणहोणी सूं/लड़ण रो हथियार।"

राजस्थानी भाषा की "नई कविता" में पिछले कुछ बरसों में महानगरीय जीवन की भाग दौड़, भीड़ से घिरे होने के बावजूद पनपे अकेलेपन के कारण रिश्तों को सहेजने के प्रति बढ़ता मोह, तकनीक पर निर्भरता की मजबूरी के कारण पनपी मानवीय व्यग्रता जैसे विषय भी शिद्दत के साथ मुखर हुए हैं। एक कविता में कवि कहता है,

"सोधूं तो/लाधै नीं/लिख्योड़ा सबद/कंप्यूटर खोलूं तो/एक फाइल सूं दूजी फाइल मांय घुसता/उडै अर चिड़ावै/आकल बाकल करता/रूंख बण जावै सबद।" शब्द की शक्ति के प्रति कवि की आस्था की एक अन्य कविता देखें, "ना अगम रैवैला/ ना आगोतर/ ना पाप रैवैला/ ना पुन्न/ना आकास रैवेला/ ना पताल/....रैवैला स्यात् सबद/ आज भी/ काल भी।"

"कविता देवै दीठ" की कविताओं का सबसे प्रभावशाली पक्ष शब्द शक्ति के प्रति कवि की आस्था और सहज में भी असामान्य की शोध करने की यह बेचैनी ही है। इसी बेचैनी की ईमानदार अभिव्यक्ति संकलन की कविताओं को पठनीय बनाती है और शब्द शक्ति के ईमानदार इस्तेमाल की यही बेचैनी कवि से लिखवाती है, "कविता/ खोलै किवाड़/ आस रा/ अबखै बगत" (कठिन समय में कविता उम्मीद के द्वार खोलती है)।

यह संग्रह समकालीन राजस्थानी कविता को एक विशिष्ट मुहावरा देता है और अपनी संप्रेषणीयता के कारण लोकभाषा में समकालीन सरोकारों के प्रगटीकरण की आस का नया द्वार भी खोलता है।

-अतुल कनक
 
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