Last updated - Thu, May 23, 2013
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अपना-अपना सुख
मन्द-मन्द बरसाती बयार में मिट्टी की सौंधी-सौंधी गंध कमल के नथुनों में सुनीता के बदन की गंध की तरह समाती जा रही थी। कमल उसी उमस से बेहाल था, मगर फिर भी वह मन ही मन बहुत खुश हुए जा रहा था। इतनी जल्दी सब कुछ हो जाएगा.... आपस में इतने खुल जाएंगे उसे यकीन ही नहीं हो रहा था। वो भी एक ही मुलाकात के बाद? इतने बरसों बाद किसी हसीन लड़की के अचानक इतने करीब आ जाने से उसे अपार खुशी मिल गई थी। अभी पिछले सप्ताह ही उसकी क्लास में सबसे आगे बैठी सुनीता ने क्लास के बाद उससे रविवार को भी क्लास लेने का आग्रह किया था। बड़ी मासूमियत से बोली थी-

"सर प्लीज सन्डे को भी आप क्लास लीजिए न। हमारी वैसे ही क्लासेज लेट शुरू हुई हैं। टाइम भी कम बचा है एग्जाम्स में।"
"हां सर प्लीज, लीजिए न।" बाकी-दस-बारह लड़कियों ने भी उसके सुर में सुर मिला दिया था।

"ठीक है आ जाइए।" कहकर वह अपनी कार की ओर बढ़ा ही था कि तभी पीछे से सुनीता ने उसे पुकारा था "एक्सक्यूज मी सर, आप कहां तक जाएंगे? अगर बस स्टैण्ड की तरफ जा रहे हैं तो प्लीज मुझे ड्रॉप कर दीजिए। आपको तकलीफ तो होगी मगर...।" कहकर वह हौले से मुस्करा दी थी। कमल उसकी बेतकल्लुफी पर हैरान, मगर खुश हो गया था। मन ही मन अपनी खुशी को छुपाते हुए फिर बोला था-
"श्यौर, मैं वहीं जा रहा हूं, आइए...।" कमल ने कार का दरवाजा खोल दिया था। वह साइड वाली सीट पर बैठ गई थी।
"आपके पति क्या करते हैं?" कमल ने कार स्टार्ट करते हुए उससे पूछा था।

"वो लॉयर हैं।"
"और कौन-कौन है घर में?"
"बस, हम दोनों और एक छोटा दो साल का बेटा।" इस बार उसने अपनी हवा में उड़-उड़ जा रही रेशमी काली लट को कान के पास खुरसते हुए कहा था।

"लाइब्ा्रेरी साइंस में डिप्लोमा अब शादी के बाद?" कमल ने उसे कुरेदा था।
"इनकी प्रैक्टिस इतनी नहीं चलती। फिर इनको भी कोई एतराज नहीं है। मैं भी घर में बैठी-बैठी बोर हो जाती हूं तो उन्होंने कहा कुछ कर लो, तुम्हारा टाइम भी पास हो जाएगा और चार पैसे भी घर में आएंगे, सो।" कहते हुए वह कार से बाहर देखने लगी थी। उसकी कान के पास खुरसी हुई काली रेशमी लट फिर से हवा में लहराकर उसके सुर्ख गालों से अठखेलियां करनी लगीं थीं।

कमल ने एक भरपूर निगाह सुनीता पर डाली थी। गदराई, गोरी... लम्बे बालों वाली, बड़ी-बड़ी झील-सी गहरी आंखों में पतला काजले, होंठों पर हल्की गुलाबी लिपस्टिक। वह किसी मॉडल से कम नहीं लग रही थी। वह करीब बारह-पंद्रह वष्ाोü से लाइब्ा्रेरी साइंस की क्लासेज ले रहा है। इस दौरान उसे कई लड़कियों ने कितने ही प्रस्ताव दिए। कइयों के प्रस्ताव कमल ने ठुकराए और कइयों के पीछे भी भागा, मगर सुनीता उनमें सबसे अलग थी, सबसे सुन्दर।

उसके सपनों की ताबीर। जिसे जल्दी से पाने की लालसा कमल के तन-मन में जाग उठी थी।
गाड़ी ड्राइव करते हुए कमल मन ही मन उसकी उम्र का अंदाजा लगाने लगा था। फिर अनायास ही पूछ बैठा था-
"अभी कितने साल और फॉर्म भर सकती हो? मेरा मतलब आपकी उम्र...?"
"सर आप ही बताइए कितनी होगी?" उसने इठलाकर कहा था।
"ये ही कोई चौबीस... पच्चीस ...?"
"नही।" वह आंखें तरेर कर बोली थी।
"तो?"

"इससे ज्यादा।"
"तो फिर, आप ही बताइए।
"बत्तीस साल।" बड़े गर्व से बालों में अंगुलियां पिरोते हुए बोली थी इस बार।
"रियली? चौबीस-पच्चीस से ज्यादा की नहीं लगती हो। कैसे मेन्टेन कर रखा है अपने आपको? सुनीता अगर पहले मिली होती तो मैं तुमसे शादी कर लेता।"

"तो क्या आपकी मैरिज हो चुकी है?"
"हां भई, दुर्भाग्य से। मगर पत्नी यहां मेरे पास नहीं रहती।" कमल ने वही रटा-रटाया डायलॉग जो वह आज तक सभी लड़कियों को मारता आया है, सुनीता पर मार दिया था और सुनीता ने बुरा मानने के बजाय मुस्करा भर दिया था। फिर कमल ने हौसला पाकर उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया था।

"लो आपका बस स्टैण्ड आ गया।" कमल ने कार साइड में लगाते हुए कहा था।
"मेरा नहीं, ये आपका ही बस स्टैण्ड है। मुझे तो अभी साठ किलोमीटर दूर जाना है।"
"ओह तो तुम बाहर रहती हो?"

"हां सर, अच्छा बाय ...सन्डे को मिलते हैं।" कहती हुई वह बस में चढ़ गई थी।
कमल की आशिक मिजाजी के बारे में उसकी पत्नी भी जानने लगी थी और न जाने कितनी ही बार उसने कमल को रंगे हाथों लड़कियों को अश्लील मैसेज करते हुए पकड़ा था। और उस दिन तो वह बुरी तरह सकपका गया था जब पत्नी ने उसके हाथ से मोबाइल छीनते हुए पूछा था-

"आप कौन बोल रही हैं। आपको सर से क्या काम है? दूसरे मर्दो से इतनी रात गए बात करते और मैसेज करते हुए तुम्हें शर्म नहीं आती? तुम इनकी स्टूडेंट हो? आईन्दा से इनको फोन करने की जरूरत नहीं है समझीं?" फिर कमल को मोबाइल थमाते हुए खा जाने वाली निगाहों से देखा था उसने।

और फिर कई दिन नहीं मिले थे एक-दूसरे से। हफ्तों गुजर गए थे उसने कमल को अपने पास आने देना तो दूर रहा फोन तक नहीं किया था। वह कमल से शादी के पहले से ही अलग शहर में किसी बी.एड. कॉलेज में पढ़ाती थी। हालांकि कमल चाहता था कि वह उसके माता-पिता के साथ ही ससुराल में ही रहे मगर उसे यह सब मंजूर नहीं था।

सो कमल तो अभ्यस्त हो चुका था इस सबका। वह जानता था थोड़े दिनों में सब अपने आप नॉर्मल हो जाएगा और शीघ्र ही रविवार भी आ गया। कमल अभी तक सुनीता की पहली मुलाकात को भुला भी नहीं पाया था और आज फिर नियत समय पर वह अन्य स्टूडेंट्स के साथ कॉलेज आ गई थी।

कमल ने एक उड़ती-सी नजर उस पर मारी-लाल ब्लाउज, लाल साड़ी, लाल लिपस्टिक, लाल घड़ी और चूडियां भी लाल। सब कुछ लाल। ऊपर से नीचे तक खिले गुलाब की तरह लाल। उसके पाउडर की पहली मुलाकात वाली जानी-पहचानी वही भीनी-भीनी खुशबू कमल की नाक में समा गई थी। वह संजीदगी से पढ़ाता रहा और सुनीता नजर बचा-बचाकर उसे देखती रही।

दो घंटे बाद क्लास खत्म हो गई। धीरे-धीरे सारे स्टूडेन्ट्स भी चले गए। कॉलेज का चपरासी भी ताला लगाने आ चुका था। आसमान पर पिछली बार से भी कहीं अधिक घनी घनघोर घटाएं घिर आई थीं। कॉलेज के पश्चिम में स्थित प्राचीन तारागढ़ पहाड़ बादलों में छिप गया था और पूरब में स्थित मदार पहाड़ भी लगभग अदृश्य हो गया था। बौछारों के साथ बिजली की गड़गड़ाहट के बीच कमल ने सुनीता से कहा-

"क्या प्रोग्राम है? मैं छोड़ दूं?" कमल ने उसकी आंखों में आंखें डाल दीं।
"सर, मौसम तो खराब है मगर आज के बाद अगले हफ्ते ही आना हो पाएगा मेरा, इसीलिए मुझे आज ही नर्सिगहोम किसी रिश्तेदार को देखने जाना पड़ेगा।"

"तो फिर आओ छोड़ दूं?"
वह कार में आगे वाली सीट पर बैठ गई। हल्की-हल्की बौछारों और ठण्डी बयार के साथ ही मौसम खुशगवार हो चला था। नागिन-सी बल खाकर उसकी गर्दन से लिपटी बरसात से भीगी लट को कमल ने अपने हाथ से हटा दिया और सुनीता ने अपने नयनों में ढेरों प्यार समेटे कमल को इस तरह देखा कि कमल अनजाने तूफान की लहरों से भीग गया। कमल ने कुछ ही देर बाद कार नर्सिगहोम के बाहर पार्क कर दी। वह एक छोटा-सा प्राइवेट नर्सिगहोम था जहां सुनीता का कोई रिश्तेदार भर्ती था। न ज्यादा मरीज और न ही ज्यादा उनके रिश्तेदार, सिवाय एक रिसेप्शनिस्ट के, जो बाहर पोर्च में खड़ी हो शायद मौसम का आनन्द ले रही थी।

दोनों कॉटेज वार्ड ढूंढते हुए उस वार्ड में पहुंच गए जहां सुनीता का रिश्तेदार भर्ती था। मगर अन्दर जाने पर पाया कि कॉटेज वार्ड तो खाली हो चुका है। शायद सुनीता के रिश्तेदार को कुछ समय पहले ही छुट्टी मिल चुकी थी। कॉटेज वार्ड का एकांत, मौसम और संगमरमर-सी तराशी सुनीता का सामीप्य पाकर कमल का ह्वदय जोर-जोर से धड़कने लगा।

वह खाली कॉटेज वार्ड और उसकी सुनसान खामोशी में सुनीता के दिल की धड़कनें सुनने की कोशिश करने लगा और फिर अनायास ही हिम्मत करके उसने सुनीता के कंधे पर अपना जलता हुआ हाथ रख दिया- "यहां तो कोई नहीं है मेरे और तुम्हारे सिवाय। अब क्या करें?" कमल की आवाज एकान्त पाकर कांपने लगी थी।

थोड़ी देर तक दोनों एक-दूसरे को देखते रहे-एकटक, फिर अनायास ही कमल का हाथ कंधे से हटाकर सुनीता ने अपने दोनों हाथों में ले लिया। उसकी आंखों में रेड वाइन जैसी रंगत उतरने लगी थी। उसने अनायास ही कमल के बिल्कुल निकट आकर पंजों के बल ऊंची हो उसके होंठों पर अपने सुलगते होंठ रख दिए। कमल जल उठा लकड़ी के कोयले-सा धू...धू... और सुनीता सुलगने लगी पत्थर के कोयले-सी धीरे...धीरे...। कि तभी नर्स की आवाज से चौंक पड़े दोनों।

"आप इधर क्या कर रहे हो? जाइए यहां से, आपके मरीज को छुट्टी मिल गई है।"
जैसे वज्रपात हुआ था दोनों पर। झेंपते हुए दोनों नर्सिगहोम से बाहर निकल कार में जा बैठे थे। दोनों खामोश थे। मौसम साफ होने लगा था। बादल तेजी से हवा में उड़े जा रहे थे। सुनीता की आंखों के डोरे अभी तक गुलाबी थे। वह कार में बैठी नीची गर्दन किए अपने दुपट्टे को ऎंठ रही थी और कमल अनायास ही चौंक पड़ा था अपनी पत्नी की याद आते ही। आज अभी ही तो उसे घर आना है। रविवार के रविवार अधिकतर वही उससे मिलने जाता है। मगर आज वह आने वाली थी। उसका ख्याल आते ही जैसे सपनों की दुनिया से लौट आया और बोला-

"आपको सीधे बस स्टैण्ड छोड़ दूं? मुझे अचानक कोई अर्जेन्ट काम याद आ गया इसलिए अभी के अभी जाना होगा। फिर नेक्स्ट सन्डे मिलते हैं।"

कमल ने उसे बस स्टैण्ड छोड़ दिया था। उसने अनायास ही कार के शीशे में अपना चेहरा देखा, कहीं कोई लिपस्टिक का निशान तो नहीं रह गया? सुनीता को छोड़कर उसने सीधे अपने घर की राह पकड़ ली। अगर उसकी पत्नी उससे पहले पहुंच गई होगी तो अनर्थ हो जाएगा। अब तक सड़क भी पूरी सूख चुकी थी और तारागढ़ से बादल पूरी तरह नदारद हो चुके थे। उसने जेब से मोबाइल निकाला और सुनीता को कॉल किया मगर बहुत देर तक घंटी जाती रही तो उसने फोन काट दिया और कार रोक कर मैसेज टाइप किया-

"आई कान्ट फॉरगेट यू। आई लव यू।" फिर मेसेज सेन्ट कर दिया। मैसेज बॉक्स से सारे मैसेज डिलीट करते हुए बड़बड़ाया-
"बीवी ने देख लिए तो बेड़ा गर्क हो जाएगा।" बड़ी मिन्नतें करने के बाद तो आती है। अगर पिताजी का ऑपरेशन नहीं हुआ तो आती भी नहीं.. मुझे ही जाना पड़ता।" उसने मन ही मन बीवी को कोसा।

दस साल यूं ही बीत गए। वो वहां और कमल अपनी नौकरी के कारण यहां, मां-बाप के पास। हर सप्ताह वही जाता रहा है और इस आने-जाने में ही उसका एक मात्र बेटा भी छह बरस का हो गया है। उसने पत्नी को कई बार नौकरी छोड़कर उसी के साथ ससुराल में रहने का आग्रह किया है मगर लगी-लगाई नौकरी वह नहीं छोड़ना चाहती। फिर कमल के पिता के चिड़चिड़े स्वभाव के कारण भी वह वहीं रहना चाहती थी सो कमल ने रहने दिया और स्वयं अपनी मस्ती में मस्त रहने लगा।

वह शीघ्र घर पहुंच गया। उसने देखा पत्नी पहले ही आ चुकी थी। उसे देखकर उसने कोई खुशी जाहिर करने के बजाय मुंह और बिगाड़ लिया-

"अब आए हो? आपको पता नहीं था कि मैं आने वाली हूं? मगर पत्नी की किसे परवाह, तू नहीं और सही।" उसने ताना मारा।
"अब मूड मत खराब करो। कई दिनों बाद आई हो तो कम से कम आज तो...।"
रात होते ही खाना खाकर दोनों बेडरूम में चले गए। औपचारिक बातों के बाद कमल के दिल का पपीहा फिर से पीहू-पीूह करने लगा। दिन की अधूरी खुमारी फिर सिर चढ़कर बोलने लगी। रात के अंधेरे में रह-रहकर वह अपनी पत्नी में सुनीता ढूंढ़ने लगा। मोबाइल के मैसेज अलर्ट से वह चौंक पड़ा। कहीं सुनीता का तो नहीं? उसने अंधेरे में टटोलते हुए मोबाइल उठा लिया। मैसेज बॉक्स में देखा तो देखता ही रह गया।

"आई लव यू सुरू। आई मिस यू वैरी मच। आई कान्ट लिव विदाउट यू..।"
तो क्या उसकी पत्नी भी सुनीता की तरह ही किसी से? उसे लगा जैसे उसके शरीर का सारा खून जम गया हो। जैसे वह गहरी खाई में गिरता जा रहा हो। उसकी आंखों के आगे अंधेरा-सा छाने लगा।

उसके हाथ में उसकी पत्नी सुरेखा का मोबाइल आ गया था। तभी उसकी पत्नी ने इस सबसे बेखबर हो उसकी ओर करवट लेकर उसके होंठों पर अपने जलते हुए होंठ रख दिए। उसके नाखून आदिम हिंसक होकर कमल की पीठ में धंसने लगे और कमल किसी मरे हुए शिकार की भांति अपनी आदिम हिंसक होती पत्नी के शिकंजे में जकड़ा पड़ा रहा एक जिन्दा लाश की तरह।

राजेश कुमार भटनागर
 
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