Last updated - Wed, May 22, 2013
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तेल खोज से ही बचेगा भारत
हम अपनी तेल जरूरत का तीन-चौथाई आयातित करते हैं, फिर भी हम उल्लेखनीय अनखोजे अवसरों को अन्वेषण व उत्पादन के लिए आगे बढ़ने में विफल रहे हैं। वर्ष 1889 की बात है, जब एक हाथी पर सवार ब्रिटिश भू वैज्ञानिक ने अनायास असम के जंगलों में भारत में पहली बार तेल की खोज की थी। पर जनाब, ये इतिहास की बात है।


सच्चाई यह है कि आज एक तरफ, हमारे 75 प्रतिशत से अधिक बेसिन सामान्य से उचित अन्वेषित श्रेणी में भी नहीं हैं और दूसरी तरफ, वित्तीय वर्ष 2011-12 के दौरान हमने 134 अरब डॉलर की भारी भरकम राशि खर्च कर अपनी तेल जरूरत का 75 प्रतिशत पूरा करने के लिए तेल का आयात किया है। आयातित तेल पर इतनी अधिक निर्भरता के चलते उच्च व्यापार घाटा और अधिक चालू खाता घाटा की स्थिति बन चुकी है। ये एक तरह का चक्रव्यूह है, जिसे केवल बुलंद दृष्टिकोण और तेज प्रक्रिया के जरिये ही तोड़ा जा सकता है।
हर चुनौती में एक अवसर भी छुपा होता है।


भारत में अन्वेषण और उत्पादन उद्योग के लिए उल्लेखनीय-अनखोजी संभावनाएं मौजूद हैं। कुल जमा 205 अरब बैरल के संभावित हाइड्रोकार्बन संसाधनों में से हमने अभी तक सिर्फ 73 अरब बैरल तेल व समतुल्य को ही खोज के जरिये सत्यापित किया है। इसका मतलब, करीब 133 अरब बैरल तेल निकाले जाने का इंतजार कर रहा है।

जब हम कुल संभावित संसाधन के इस 65 प्रतिशत हिस्से को "खोजा जाना शेष" की श्रेणी से निकाल कर "दोहन योग्य" की श्रेणी में ले आएंगे, तो होने वाला लाभ देश के लिए एक पुरस्कार से कम नहीं होगा।


भारत में औसतन प्रति वर्ष तेल खोज के लिए करीब 200 तेल कुंए खोदे जाते हैं, जबकि यूएस में यह आंकड़ा 2000 के पार जाता है। जरूरत इस बात की है कि भू-वैज्ञानिक जोखिम लेते हुए 30 लाख वर्ग किलोमीटर में फैले 26 हाइड्रोकार्बन बेसिन के हर संभावित क्षेत्र में खोज को तेज किया जाए।


तेल व प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने हाल में महत्वपूर्ण पहल की है। वर्ष 2020 तक तेल आयात 50 प्रतिशत कम करने का लक्ष्य है, वर्ष 2025 तक 75 प्रतिशत, वर्ष 2030 तक 100 प्रतिशत कम करने का लक्ष्य है, रोडमैप बनाया जा रहा है।
"हाइड्रोकार्बन विजन 2025" के अनुसार वर्ष 2025 तक सभी तेल बेसिन में अन्वेषण करने का प्रावधान है। यह उपलब्धि हासिल करने के लिए हमें अगले पांच वर्षो में कुछ खास कदम उठाने होंगे, ताकि हमारे 50 प्रतिशत बेसिन सामान्य से उत्तम अन्वेषित श्रेणी में आ सकें।

ओपन एरिया लाइसेंसिंग पॉलिसी को तेजी से लागू किया जाए, जिससे संभावित ब्लॉक्स की नीलामी प्रक्रिया का इंतजार किए बिना उद्योगों को खोज करने के लिए तेजी से बढ़ने का अवसर मिले। नियामक ढांचे को ग्लोबल स्टैंडर्ड के मुताबिक पुनर्गठित किया जाए, जो स्व-शासन, विश्वास व भागीदारी के सिद्धांतों पर आधारित हो।


घरेलू तेल उत्पादन का हमारी सरकार पर परिवर्तनकारी प्रभाव पड़ता है। राजस्थान सबसे ताजा उदाहरण है। राजस्थान के 2013-14 बजट अनुमान के मुताबिक, पेट्रो सेक्टर से मिलने वाला राजस्व राज्य सरकार को होने वाली गैर-कर आय का 40 प्रतिशत है, जबकि सन् 2008-09 में यह मात्र 0.2 प्रतिशत था। बाड़मेर से होने वाले तेल उत्पादन के कारण पेट्रोलियम सेक्टर राजस्थान सरकार के गैर-कर आय में 5,500 करोड़ रूपए का योगदान देगा, इससे राज्य सरकार को विकास परियोजनाओं के लिए अधिक धन मिलेगा।


केयर्न ने राजस्थान ब्लॉक से उत्पादन तेल खोज के महज पांच वर्ष में कर दिया था। राजस्थान ब्लॉक से वर्तमान में हो रहा उत्पादन देश के कुल तेल उत्पादन का बीस प्रतिशत है। गत 3 वर्ष में बाड़मेर बेसिन के बारे में हमारी समझ बढ़ी है तथा हम यहां भारी संभावनाएं देखते हैं। हम राजस्थान में उपस्थित संभावनाओं को शीघ्र खोज निकालने को तत्पर हंै।


खोज से आपूर्ति तक : तेल खोज से लेकर आपूर्ति तक 50 प्रतिशत समय "मुझे तुम पर भरोसा नहीं" की भावना वाले पेचीदा अनुमोदन प्रक्रियाओं में व्यर्थ गंवा दिया जाता है। यही कारण है, अप्रैल 2012 तक की गई 117 नेल्प तेल खोजों में से केवल 11 प्रतिशत की विकास योजनाएं मंजूर की गई हैं और बहुत कम खोजों से उत्पादन शुरू हो पाया है, भले ही हम रोजाना 1800 करोड़ रूपए तेल आयात करने में खर्च करते जा रहे हैं। खोज से उत्पादन तक का समय घटाने के लिए लक्ष्य तय करने होंगे। तेल और गैस सेक्टर में कोई उपकरण या सुविधा ऎसी नहीं है, जिसे शुरू करने में 18 माह से ज्यादा समय लगे। देश में खोज व उत्पादित तेल का प्रति बैरल आयातित बैरल से सस्ता पड़ेगा।

घरेलू उत्पादन से प्रति बैरल 100 डॉलर विदेशी मुद्रा की बचत हो सकेगी।

मजबूत शासन : त्वरित तेल खोज प्रयासों और खोज से उत्पादन के बीच की प्रक्रियाओं में तेजी लाने के लिए जरूरी है कि अन्वेषण-उत्पादन क्षेत्र के लिए शासकीय ढांचा मजबूत हो। इसके लिए पूर्ण, स्थायी तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर के कुशलता के साथ देश के तेल व गैस संसाधन आधार के प्रबंधन की जरूरत है। एक आकलन के मुताबिक, प्राप्त होने योग्य 2041 मिलियन मीट्रिक टन तेल और समतुल्य भंडारों का मूल्य एक ट्रिलियन डॉलर से अधिक है, जो भारत में सूचीबद्ध सभी कंपनी के कुल मार्केट कैपिटलाइजेशन के बराबर है। अगर शेयर मार्केट के सही तरीके से संचालन के लिए सेबी जैसी संस्था है, तो क्यों न तेल खोज को नियंत्रित करने वाले हाइड्रोकार्बन महानिदेशालय को और विकसित बनाया जाए, ताकि तेल खोज में निवेश को प्रोत्साहित किया जा सके, ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ावा दिया जा सके और देश हित की रक्षा की जा सके।


नॉर्वे के नियामक मॉडल को भारत ने आधार बनाया, उससे सीख ली जा सकती है। नॉर्वे ने तकनीकी रूप से सक्षम नियामक संस्था- नार्वेजियन पेट्रोलियम निदेशालय को कानूनी शक्तियां सौपी हैं। सुस्पष्ट प्रक्रियाएं, तेज और पारदर्शी निर्णय, तय समय सीमा के साथ अनुमोदन, वो खासियत हैं, जो नॉर्वे की इस संस्था को मानक का दर्जा प्रदान करते हैं। यही वजह है, नॉर्वे ने तेल के जरिये 700 अरब डॉलर का राजकोष खड़ा कर लिया है। अगर हमने अभी कदम नहीं उठाए, तो इसकी कीमत हमे ही चुकानी होगी। हम बैठे-बिठाए 1.5 ट्रिलियन डॉलर से अधिक की विदेशी मुद्रा तेल उत्पादक देशों की झोली में डाल देंगे।


बदलाव लाने के लिए यह जरूरी है कि हम एक मिशन के रूप में तेल खोज के काम में तेजी लाएं, खोज से उत्पादन के बीच के लंबे अंतराल को कम करें और शासन को मजबूत करें, जिससे आर्थिक विकास हो सके। इन प्रयासों का पुरस्कार बहुत बड़ा होगा और यही कारण है कि हाइड्रोकार्बन विजन को साकार करने की यात्रा बहुत उत्साह बढ़ने वाली होगी। बशर्ते हम उठें और आगे बढें। (साभार : हिन्दू बिजनस लाइन)

 
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