माफी मांगें!

आज आप भारत के किसी भी प्रदेश में जाकर देखें तो वहां कन्या या बेटी के नाम पर दर्जनों योजनाएं चलती हुई पाएंगे। "बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ," मुफ्त किताबें, शिक्षा, बीमा, साइकिलें, विवाह के प्रबंध, भ्रूण हत्या रोकने के अभियान आदि देखकर आपका गला भर आएगा। आंखें नम हो जाएंगी कि आज भी इस देश में देवी रूप है बेटी का। धन्य हैं!
दूसरी ओर उन्हीं प्रदेशों में गैंगरेप के भी समाचार बराबर छप रहे हैं। छत्तीसगढ़ के झलियामारी गांव में शिक्षक और चौकीदार ही दो साल से, 7 से 10 साल की छात्राओं से दुष्कर्म करते पाए गए। जो छात्राएं अन्य स्कूलों में जा चुकी, वे भी इस तथ्य को स्वीकार चुकी हैं।
आमाडूला ग्राम की महिला अधीक्षक अनिता राठौड़ को पुलिस ने गिरफ्तार किया है, जो बन्द गाड़ी में आने वाले लड़कों का खाना बनाने के नाम पर छात्राओं को भेज रही थी। मध्य प्रदेश में गैंगरेप के दर्जनों मामले हर माह रिकॉर्ड होते हैं। कई मामलों में तो नेता भी जुड़े होते हैं।
केन्द्र सरकार कानून 354 (भादंसं) में संशोधन पारित कराने को आमदा दिखाई दे रही है। मंत्रिमंडल कानून को हरी झंडी दिखा चुका है। इस कानून मे "16 वष्ाü की उम्र में लड़की को स्वेच्छा से किसी पुरूष के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाने की छूट होगी। किन्तु 18 वर्ष की आयु से पहले विवाह नहीं कर सकेगी।"
क्या कन्या आज भी स्वतंत्र नहीं है? सरकार ने कण्डोम और गर्भ निरोधक गोली जैसे साधनों को प्रचारित करके देश की पीढ़ी को यौनाचार में ही धकेला है। कालाधन भोग में प्रवृत्त करता है। दूसरी ओर शिक्षा ने भी जीवन को नैतिकता से हटाकर भोग में ही प्रेरित किया है। किन्तु इस कानून की प्रासंगिकता समझ में नहीं आ रही है।
क्या इससे गर्भपात, कुंवारी मां बनने अथवा आत्म-हत्याओं की संख्या में बाढ़ नहीं आ जाएगी? सरकार इस उम्र की लड़कियों का भविष्य कहां देख रही है। क्या 18 वर्ष से पहले बनने वाली कुंवारी मां की सन्तान वैध मानी जाएगी? क्या ऎसी लड़कियों से लड़के शादी करना चाहेंगे? क्यों नहीं लड़कियों की शादी की उम्र ही घटाकर 16 साल कर दी जाए? इस कानून का परोक्ष लाभ किसको मिलेगा, सोचा जा सकता है। पुलिस की तो चांदी हो जाएगी। वैसे भी उसकी जनता के दुख-दर्द में रूचि धन पर आधारित हो ही चुकी है।
वह तो "सरकार" के लिए काम करने वाली हो गई है। दूसरी ओर दिल्ली की घटना का मुख्य आरोपी संभवत: बरी हो सकता है, क्योंकि उसकी उम्र 18 साल से कुछ ही कम है। क्या इस कानून के बाद भी उसे बाल अपचारी ही माना जाएगा? पुलिस आमतौर पर पीडिता का साथ देती कहां है! वह तो अभिभावकों को भी धमकाती है चुप रहने के लिए।
अजमेर-जयपुर के अश्लील फोटो काण्ड से जुड़ी कितनी लड़कियों ने आत्म-हत्या की, कितने परिवार शहर छोड़ गए, क्या पुलिस की आंख में आंसू देखा किसी ने? इस कानून को भी लागू तो यही "विदेशी तर्ज वाली" पुलिस ही करेगी।
इस कानून से एक बात तो स्पष्ट हो गई कि संसद में भारतीय सभ्यता और संस्कृति के जानकार और पोषक नगण्य रह गए हैं। राज्यसभा तो उन्हीं प्रतिनिधियों की बनती जा रही है जिनका जनाधार नहीं दिखाई पड़ता। तब क्या यह कानून प्रभावी लोगों की गिद्ध दृष्टि के पोषण का संकेत नहीं माना जाएगा? मानव जीवन में पशुता की यह सार्वजनिक स्वीकृति?
सोलह से अठारह की उम्र तक सम्बन्ध तो रहे पर शादी न कर पाएं, तब क्या यह वैश्यावृत्ति की ओर धकलने का रास्ता नहीं है? अथवा जो अमीरजादियां पहले ही इस मार्ग पर आगे बढ़ चुकी हैं, उनको संरक्षण देना इस कानून का उद्देश्य है? क्या जनता ऎसे कानूनों के लिए ही जनप्रतिनिधि चुनती हैं? जो संस्कृति एवं सभ्यता से जुड़े कानूनों पर भी जनता की राय नहीं जानना चाहते। यह सही है कि सत्ताधारियों के लिए यौनाचार एक खिलौना ही है, किन्तु इसे कानूनी रूप देकर देश को दुष्कर्म की ओर धकेलना तो निन्दनीय अपराध है। उन्हें देशवासियों से माफी मांगनी चाहिए।
भारतीय संस्कृति में तो आज भी मां-बाप और बच्चे स्वयं को पवित्र रखकर ही जीना चाहते हैं। जहां-जहां पश्चिम की शिक्षा, संस्कृति घरों में घुस गई, वहां शरीर भी भोग की वस्तु बन गया। शरीर आत्मा का, ईश्वर का मन्दिर भी है, किसको याद रहेगा! रिश्तों के मूल्य स्वत: ही बदल जाएंगे। यहां तक की बच्चों और माता-पिता में भी तकरार और दरार दिखाई देने लगेगी। तब तक कानून के निर्माता किसी अन्य योनि में अपने किए का फल भोग रहे होंगे। क्योंकि इस कानून ने हमारे नेताओं तथा अधिकारियों के सामूहिक विवेक को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है। ये तो हमारी ही आबरू लेने पर उतर आए। ये भी सोच से भारतीय नहीं लगते। यदि ये घर में पत्नी/ पति और बच्चों से भी पूछ लेते, तो सही उत्तर मिल जाता। किन्तु इनका अहंकार तो महिला एवं बाल विकास मंत्री के मत का सम्मान भी नहीं कर पाया। धिक्! यह संकेत स्पष्ट है कि यह कानून आम आदमी के हितों को ध्यान में रखकर नहीं बनाया जा रहा।
हो सकता है कि कुछ वष्ाोü बाद यह उम्र 13-14 वर्ष कर दी जाए। कुछ भी हो, नया कानून अमर्यादित जीवन शैली को बढ़ावा देगा। देश को प्रकृति के थपेड़े खाने पड़ेंगे। देश में तरह-तरह का यौनाचार बढ़ेगा। इसी के साथ नये रोगों की उत्पत्ति का मार्ग प्रशस्त होगा। स्वास्थ्य में और गिरावट आएगी। कमजोर वर्ग तथा आदिवासी क्षेत्रों में यौन शोषण स्वच्छन्द रूप से होने लगेगा।
रिश्वत में अस्मत की मांग बढेगी। कुंवारी मां के सम्मान की समस्या बड़ी हो जाएगी। नैतिकता के क्षरण के साथ ही मानवीय गुणवत्ता और संवेदना धराशायी होने लगेंगे।
पूरा देश भ्रष्टाचार और यौनाचार का अखाड़ा बन जाएगा। अपहरण, आत्म-हत्याएं, गंैगरेप जैसे अपराध बढेंगे। प्रभावशाली, दबंग डण्डे के बल पर यौनाचार करेंगे। सामन्ती युग याद आ जाएगा। लोकतंत्र लाचार होकर आंसू बहाएगा। तब इस देश में क्या बचेगा! पशु रूप शरीर में असंस्कारित पशु आत्मा का ताण्डव होगा। जंगल-सा मुक्त उन्माद और सन्तों के मुखौटों का होता उपहास!
इस कानून का पास होना भारतीय लड़कों के लिए भी अपमान की बात होगी।
यह संदेश भी जाएगा कि वो अब दुश्चरित्र हो गए हैं। उनकों भी लड़कियों के साथ-साथ दृढ़ता से अपना विरोध दर्ज कराना चाहिए। जो दूसरा समर्थन करते नजर आए, उनका समाजिक बहिष्कार करने का संकल्प भी कर लें। आजकल तो सत्ताधारी इतने बेशर्म हो गए हैं कि रिश्वत में भी अस्मत मांगने लगे हैं। इनको नरभक्षी कहना भी कम है। शास्त्र कहते हैं कि ऎसे लोगों को ईश्वर अगले जन्म में श्वान-कुक्कुट ही बनाता है इनके विरूद्ध देश को जगाना पड़ेगा। लोकतंत्र "जनता के द्वारा" भी है। इसे हम ही बचा सकते हैं। उठो! खाओ कसम!
गुलाब कोठारी