Last updated - Sat, May 18, 2013
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सन्नाटा
रात का अन्तिम पहर। कमरे में सुगंधा, मैं और था सिर्फ सन्नाटा। विचार सहमे हुए और शब्द मौन। मन्दिर की घंटियों के स्वर रात के सन्नाटे को बींध रहे थे। अलसुबह हो गई थी शायद, पर रात का अंधकार अभी भी उतना ही गहन, उतना ही खामोश था। मन की घुटन रातभर चहलकदमी करते-करते भी थकी नहीं थी। आंखों में रतजगे के बाद भी नींद नहीं थी, था तो सिर्फ एक सन्नाटा...गहन सन्नाटा....।

सुबह की आहट होते ही, रातभर से बेजान सुगंधा दरवाजा खोलकर बाहर निकली थी। कमरे में फिर वही खामोशी, फिर वही शून्यता। यह सन्नाटा पहले घर में, फिर मन में और सवेरा होते ही घर के बाहर चला जाएगा। मन की उलझन और उलझती जा रही थी। कौन जाने यह कब सुलझेगी और सुलझेगी भी या नहीं। यह सवाल ही था, जो मन में एक गुत्थी बन गया था। यही सोच था, जिसे सोचते-सोचते करवटों में ही गुजर गई थी सारी रात।

भोर की पहली किरण से शहर जगमगाने लगा था, पर मेरी मन:स्थिति ठीक इसके विपरीत थी। सवेरा जैसे-जैसे उजला हो रहा था, वैसे-वैसे ही मन का अंधेरा और गहरा होता जा रहा था। मन की पीड़ा ही ऎसी थी, जिसे शब्दों में अभिव्यक्त करना असंभव था। अभिव्यक्ति का अर्थ हर तरफ बदनामी....और चुप्पी? चुप्पी का मतलब, अपनी ममता का गला घोटना।

आधी रात तक बहुत भाग-दौड़ की थी, पर सब कुछ व्यर्थ, नतीजा शून्य... और अन्त में नाकामयाबी ही नाकामयाबी। सारे प्रयास विफल, सारे परिचय बोने। समझ नहीं पा रहा था कि जाऊं तो जाऊं कहां? घर आया तो सुगंधा का बुरा हाल हो रहा था, रो-रो कर अपना आपा खो चुकी थी वह। मुझे देखते ही लिपट गई थी-

-क्या हुआ, आलोक? कुछ भी करो, पर मुझे मेरी काजल लाकर दे दो। हमारी तो किसी से दुश्मनी भी नहीं थी, फिर कौन ले गया हमारी बेटी को? तुम तो हमेशा कहते थे,"सुगंधा, मैं कोई छोटा-मोटा जर्नलिस्ट नहीं हूं, माना हुआ क्राइम रिपोर्टर हूं। किसी भी अपराध घटना की इतनी इन्ट्रेस्टिंग लाइव स्टोरी मेरे अलावा कोई नहीं बना सकता। मेरी स्टोरी पाठक को ऎसा आभास देती है, जैसे वह उसे पढ़ नहीं, देख रहा हो।"

नहीं जानता कि सुगंधा मेरी तारीफ कर रही थी, या तौहीन, मेरा हौसला बढ़ा रही थी या हिम्मत तोड़ रही थी। उसके शब्दों की चुभन मैं अन्दर तक महसूस कर रहा था। धीरे-धीरे लगातार बढ़ता ही जा रहा था, उसका बिलखना-

-कुछ भी करो, आलोक, कहां गई तुम्हारी जान-पहचान? बहुत रोकती थी, पर तुम नहीं माने। कहते थे कि ये शहरी गुण्डे हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते। मेरी संतरी से लेकर मंत्री तक चवन्नी चलती है। एक फोन किया और सब अन्दर।

- हमारा समय ही नाजुक आ गया है। आधी रात तक मदद के लिए भटक आया, पर कोई रास्ता नहीं मिला। मंत्री आउट ऑफ स्टेशन है। एस.पी. साहब ने जरूर इंचार्ज को फोन कर दिया है। पर उसने भी आश्वासन ही दिया है-

-आप चिन्ता मत कीजिए, आलोक साहब। एस.पी. साहब ने भी आपकी सिफारिश की है। उनके फोन के साथ ही पुलिस हरकत में आ गई है। आप इत्मीनान रखिए। पुलिस कन्ट्रोल रूम से शहर के हर चौराहे और रास्ते पर नाकाबंदी कर आने-जाने वाले से पूछताछ की जा रही है। संदिग्ध स्थानों पर पुलिस टोलियां भी रवाना कर दी गई हैं। थोड़ी हिम्मत तो आपको भी रखनी पड़ेगी। समय जरूर लग सकता है, पर अपराधी पुलिस से बच नहीं सकता।

यह बात तो आप भी जानते ही हैं कि अपराधी पुलिस को बता कर तो अपराध करता नहीं है कि आपने रिपोर्ट लिखाई और पुलिस अपराधी को गिरफ्तार कर ले। हमने तहकीकात शुरू कर दी है, इसमें थोड़ा वक्त तो लगेगा ही। सूचना मिलते ही आपको रिंग कर देंगे।

टूटी हुई हिम्मत से ही सुगंधा को हौसला देने की कोशिश की थी। यह बात जानते हुए भी कि सिर्फ दिलासाओं से हिम्मत नहीं आती। ठोस प्रयास न हमारे वश में थे, न पुलिस के... फिर भी एक उम्मीद को जिन्दा रखना जरूरी था।

सारी रात न आंखों में नींद थी, न मन में चैन। एक मां-बाप की अन्तरात्मा ही जानती है कि औलाद का वियोग क्या होता है? रातभर आंखों में नींद की जगह सन्नाटा भरा था, एक बेचैनी बसी थी। रात भर रोते-रोते सुगंधा की आंखें भी सूज गई थीं। काजल की कुछ घंटों की जुदाई ने हमसे हमारी सारी क्षमताएं छीन ली थीं।

लाचार, बेजान से, लाशों की तरह हो गए थे हमारे शरीर।
शहर में आए दिन होने वाली ऎसी दुर्घटनाओं से कभी-कभी तो लगता है कि शहर का माहौल अब किसी के लिए भी महफूज नहीं है, पर शहर छोड़कर कोई जाएं भी तो जाएं कहां? घीरे-धीरे हर इन्सान ऎसी दहशतों का आदी होता जा रहा है। अखबार की खबरें पढ़कर इन्सान थोड़े समय तक तो चिन्तित रहता है, संभलकर भी चलता है, पर फिर भूल जाता है और व्यस्त हो जाता है अपनी रूटीन लाइफ में।

उजाला खिड़कियों से अन्दर झांकने लगा था। उदास सी सुगंधा फिर कमरे में आ गई थी। वह अब भी रोे रही थी, मगर आंखों से नहीं, दिल से, आंखों के आंसू तो कब के सूख गए थे। मोबाइल की रिंगटोन ने मेरे विचारों की श्रंखला को तोड़ डाला था-
-यस...।
-आलोक जी, मैं कोतवाली से राठौड़।
-हां कहिए, सर।
- पुलिस को एक लड़की की लाश बरामद हुई है। उसकी उम्र भी आपकी बेटी के बराबर सी ही है। आप तुरंत यहां चले आएं, ताकि लाश की पहचान हो सके।
- लाश...?

लाश का नाम सुनते ही शरीर में सनसनी सी दौड़ गई थी, पैरों की जमीन मानों नीचे धंस गई थी। सुगंधा हमारी बात सुनते ही जोर-जोर से रोने लगी थी। मैंने उसे चुप कराते हुए कहा था-
-चुप हो जाओ, सुगंधा, यह लड़की काजल नहीं है।

कहने को तो मैं कह गया था, पर मेरे हालात इतने विचित्र हो गए थे कि आंखों के आगे अंधेरा गहराने लगा था। एक क्षण के लिए धरती आकाश तेजी से घूम गए थे। यह तो शुक्र था कि मैं बैड पर लेटे हुए था। यदि खड़ा होता तो गश खाकर कभी का गिर गया होता। मेरा मन भी दहाड़े मार कर रोने को हो रहा था। समझ नहीं आ रहा था कि खुद रोऊं, या सुगंधा को चुप कराऊं।
इन्सपेक्टर ने जो कुछ भी कहा था, वह सब मैं नहीं सुन पाया था। मौत का नाम ही इतना घिनौना होता है कि सुनने से पहले मन घबरा जाता है। राठौड़ के आखिरी शब्द अब भी कानों में गूंज रहे थे-

-मि. आलोक, लड़की की डेडबॉडी मॉरचरी में रखी हुई है, आप जल्दी से कोतवाली आ जाएं, ताकि हम हॉस्पीटल चलकर डेडबॉडी की पहचान कर लें।

बात पूरी होते ही फोन कट गया था। एक सवाल अभी भी मेरे जहन में घूम रहा था-
-यह डेडबॉडी यदि काजल की हुई तो मैं क्या करूंगा? सुगंधा को कैसे समझाऊंगा? वह तो जीते जी ही मर जाएगी।
विचारों का तूफान इतनी तेजी से मन मस्तिष्क में घूम रहा था कि मैं अपनी सुध-बुध खो बैठा था। गुमसुम....एकदम मौन। सुगंधा ने ही विचारों की तन्द्रा तोड़ी थी-

-आलोक, बताओ ना, इन्सपेक्टर क्या कह रहा था? हमारी काजल दुनिया में है भी, या नहीं।
- इन्सपेक्टर? कुछ नहीं...। हमारे रिश्तेदारों और परिचितों के नाम, पते और टेलीफोन नम्बर मांग रहा था, ताकि वह उनसे काजल के बारे में पूछ सके।

- पुलिस हमारे रिश्तेदारों से ही पूछेगी कि हमारी काजल को उन्होंने तो अगुवा नहीं किया, क्यों? पर बदमाशों से कभी नहीं पूछेगी। आलोक मुझे तो लगता है कि हमारी काजल को उन बदमाशों ने अगुवा किया होगा, जिनकी क्राइम न्यूज तुमने अपने न्यूजपेपर में पब्लिश करते रहे हो। यह तो अपराधियों और मीडिया की आपसी रंजिश का मामला लगता है, जिसके शिकार हम हुए हैं।
सुगंधा की यह बात सही भी हो सकती है। पहली बार उसने अपने दिमाग का सही दिशा में यूज किया था। अपनी क्राइम न्यूज के माध्यम से मैंने ऎसे अपराधियों को भी बेनकाब किया था, जिन्हें पुलिस बीस वर्षोü में भी नहीं पकड़ पाई थी। मेरी न्यूज सीरीज ने ऎसे केस भी रि-ऑपन किए थे, जिन्हें पुलिस ने एफ.आर लगा कर कभी के बंद कर दिए थे।

अपराधियों द्वारा क्राइम रिपोर्टर को अपना जातीय दुश्मन समझ लेना, कोई नई बात नहीं थी। पत्रकारिता में मुझे दस वर्ष से भी ज्यादा समय हो गया था। सबसे पहले मुझे क्राइम बीट ही मिली थी और आज तक उसी में चल रहा था। मेरी फर्स्ट रिपोर्टिग को इतना रेस्पॉन्स मिला था कि पिछले बीस सालों से फरार एक बलात्कारी भी गिरफ्तार हुआ था। जवानी में किए अपराध की सजा उसे बुढ़ापे में आकर मिली थी और नवयौवना उम्र में प्रताडित हुई लड़की को दादी बनने के बाद न्याय मिला था। इस न्यूज पर तो मुझे सम्मानित भी किया गया था।

ठीक आठ बजे मैं कोतवाली पहुंच गया था। इन्सपेक्टर ने मुझे एक लिफाफा दिया था, जिस पर किसी का भी नाम पता नहीं था। कंपकंपाते हाथों से पत्र पढ़ने लगा था-
- आदरणीय मम्मी-पापा,
चरण स्पर्श,
आपकी बेटी काजल ने अपने और आपके मुंह पर ऎसी कालिख पोत दी है, जिसे किसी भी गंगाजल से नहीं धोया जा सकता। यह समझ लेना कि आपके काजल नाम की कोई बेटी हुई ही नहीं थी। विफल जिन्दगी जीने से कोई फायदा नहीं है। सिर्फ नुकसान उठा कर जिन्दगी को भला कौन इन्सान जी सकता है? यही सोच कर मैं आपसे इतनी दूर चली जाना चाहती हूं कि आपको कभी भी मेरे बेटी होने का अफसोस न हो। मुझे आशा है कि आप मुझे अपनी बेटी समझकर जरूर माफ कर देंगे।

सागर को मैं बहुत प्यार करती थी, यह जानते हुए भी कि मेरा सागर भी उतना ही खारा था, जितना उसका नाम। मैं उससे बेहद प्यार करती थी। प्यार चीज ही ऎसी है, जो एक बार हो जाता है तो कभी खत्म नहीं होता। मैं उसी के साथ अपनी जिन्दगी बिताना चाहती थी, पर वह हमेशा मुझे यूज करता रहा। फिर भी मैं उसके झूठे प्यार पर अपना सबकुछ न्योछावर करती जा रही थी, पर उसने कभी मेरी भावनाओं को नहीं समझा। वह हमेशा मुझे छलता रहा।

और जब मुझे होश आया तो बहुत देर हो चुकी थी। पापा, आज जब मैं उसके बच्चे की मां बन गई हंू तो वह मुझे दुत्कार कर चला गया। मुझे मेरे जीवन से घृणा सी हो गई है। मैं नहीं चाहती कि कोई मेरे प्यार को नफरत की नजर से देखें। इसीलिए मैं बदनाम जिन्दगी जीने से अच्छा समझती हूं कि मौत को गले लगा लिया जाए।
अच्छा तो अब मैं चलती हूं। अलविदा!

आपकी काजल।
पत्र समाप्त करते ही आंखों के आगे धंुधलका छाने लगा था। मैं वहीं कुर्सी पर बैठ गया था। बैठते ही टेबल पर रखे न्यूजपेपर पर नजर गई तो आंखें खुली की खुली रह गई थीं। उसमें बड़ी-बड़ी हैडलाइन में लिखा था-

"पत्रकार की इकलौती बेटी ने की आत्महत्या, दो वर्षो से थी देह शोषण की शिकार"
शहर का सन्नाटा आज मेरे मन पर छा गया था। आंखों के आगे का धुंधलका और गहरा हो गया था। काजल का लाचार चेहरा अब भी मेरी आंखों के आगे आ खड़ा हुआ था।

रणवीर सिंह राही
 
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